1. प्रस्तावना
(Introduction):
किसी भी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता और प्रभावशीलता का
निर्धारण इस बात से होता है कि पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों का अभिकल्पन (Designing) कितनी वैज्ञानिक, व्यवस्थित और शिक्षार्थी-केंद्रित
प्रक्रिया
के माध्यम से किया गया है। यहाँ
अभिकल्पन का अर्थ केवल विषयों या अध्यायों का चयन करना नहीं है। यह एक व्यापक और
रणनीतिक प्रक्रिया है,
जिसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि क्या पढ़ाया जाएगा, क्यों पढ़ाया जाएगा, कब पढ़ाया जाएगा और कैसे पढ़ाया जाएगा।
एक प्रभावी अभिकल्पन सुनिश्चित करता है कि शिक्षा अपने सामाजिक, बौद्धिक, भावनात्मक और मानवीय उद्देश्यों को प्राप्त कर सके। यह शिक्षार्थियों को
केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि
उनकी सृजनात्मक क्षमता, आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान कौशल और सामाजिक
जिम्मेदारी
का विकास भी करता है। अभिकल्पन के
माध्यम से शिक्षक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि शिक्षा न केवल पाठ्य-पुस्तक आधारित
हो, बल्कि छात्र के अनुभव, रुचियों और वास्तविक जीवन की
परिस्थितियों के अनुरूप हो।
आधुनिक शैक्षणिक दृष्टिकोण में पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक—तीनों को एक समन्वित, सतत और गतिशील प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। इसका अर्थ है
कि शिक्षा स्थिर या यांत्रिक रूप से संचालित नहीं होती, बल्कि यह समय, समाज और तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप नवाचार, अद्यतन और सुधार के लिए खुली रहती है। इस दृष्टिकोण में
पाठ्यचर्या व्यापक शैक्षिक अनुभव का निर्धारण करती है, पाठ्यक्रम उस अनुभव को संरचित और
क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है, और
पाठ्य-पुस्तक इसे व्यवहार में लागू करने का मार्गदर्शन प्रदान करती है।
इस प्रकार, पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक का अभिकल्पन शिक्षा को सामाजिक उपयोगिता, व्यक्तिगत विकास और बौद्धिक सशक्तिकरण का माध्यम बनाता है। शिक्षार्थियों के लिए यह न केवल ज्ञान का स्रोत होता है, बल्कि अनुभव, कौशल और मूल्य आधारित शिक्षा प्राप्त करने का अवसर भी प्रदान करता है। यही कारण है कि शैक्षणिक डिजाइनिंग को शिक्षा की सफलता और प्रभावशीलता में केंद्रीय भूमिका प्राप्त है।
2.
अभिकल्पन (Designing) की
अवधारणा
अभिकल्पन
से तात्पर्य उस
योजनाबद्ध
प्रक्रिया
से है, जिसमें
शैक्षिक उद्देश्यों के अनुरूप—
1. विषयवस्तु
का चयन (Selection of Content)
विषयवस्तु का चयन अभिकल्पन का पहला और
सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसमें यह तय किया जाता है कि शिक्षार्थियों को कौन-सा ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रदान किए जाएँ। विषयवस्तु का चयन केवल
पुस्तक आधारित जानकारी तक सीमित नहीं होता, बल्कि
इसमें जीवनोपयोगी अनुभव, सामाजिक संदर्भ और व्यक्तिगत विकास को भी ध्यान में रखा जाता है। इसके
अंतर्गत यह विचार किया जाता है कि कौन-सी जानकारी वर्तमान समाज और भविष्य की
चुनौतियों के अनुरूप उपयोगी है। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि चयनित
विषयवस्तु आयु, रुचि, क्षमता और पूर्वज्ञान के अनुसार शिक्षार्थियों के लिए उपयुक्त
और समझने योग्य हो।
2. उसका
संगठन और क्रमबद्धता (Organization
and Sequencing of Content)
विषयवस्तु के चयन के बाद उसका संगठन और क्रमबद्धता अत्यंत आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह
सुनिश्चित करना है कि शिक्षार्थी ज्ञान को तार्किक, अनुशासित और सहज क्रम में ग्रहण करें। विषयों और अध्यायों को सरल से जटिल, ठोस से अमूर्त और ज्ञात से अज्ञात के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है।
इसके अलावा, सामग्री को अंतर-विषयक (Interdisciplinary) दृष्टिकोण से भी जोड़ना चाहिए, ताकि छात्र विभिन्न विषयों के बीच संबंध
और वास्तविक जीवन से उनका अनुप्रयोग समझ सकें। इस क्रमबद्धता से शिक्षा में संतुलन और निरंतरता बनी रहती है।
3. शिक्षण-अधिगम
गतिविधियों की योजना (Planning
of Teaching-Learning Activities)
विषयवस्तु के संगठन के बाद यह तय करना आवश्यक है कि कौन-सी गतिविधियाँ और शिक्षण विधियाँ अपनाई जाएँ। यह योजना सुनिश्चित करती है कि शिक्षार्थियों का अधिगम सक्रिय, अनुभवात्मक और अर्थपूर्ण हो। इसमें कक्षा-आधारित गतिविधियों, परियोजना कार्य, प्रयोग, समूह चर्चा, खेलकूद और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का समावेश किया जाता है। शिक्षण-अधिगम गतिविधियाँ छात्रों की सृजनात्मक सोच, आलोचनात्मक क्षमता और समस्या-समाधान कौशल को विकसित करती हैं। इसका उद्देश्य केवल ज्ञान का संचार नहीं, बल्कि छात्रों को संपूर्ण व्यक्तित्व और व्यवहारिक कौशल प्रदान करना होता है।
4. मूल्यांकन
की विधियाँ (Methods of
Evaluation)
अंत में, अभिकल्पन में मूल्यांकन की विधियों का निर्धारण शिक्षा की प्रभावशीलता
सुनिश्चित करता है। मूल्यांकन केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह अधिगम की प्रगति, कौशल और व्यवहारिक क्षमताओं का आकलन करता है। इसमें सतत मूल्यांकन, परियोजना कार्य, आत्म-मूल्यांकन, सहकर्मी मूल्यांकन और प्रायोगिक
गतिविधियों को
शामिल किया जाता है। मूल्यांकन का उद्देश्य शिक्षार्थियों की शिक्षण-अधिगम यात्रा को मार्गदर्शित
करना, सुधार करना और उन्हें आत्मसुधार के लिए
प्रेरित करना है।
3.
पाठ्यचर्या का अभिकल्पन (Designing of Curriculum)
(i) पाठ्यचर्या
अभिकल्पन का अर्थ (Meaning of Curriculum Designing)
पाठ्यचर्या का अभिकल्पन केवल विषयों और अध्यायों का चयन नहीं
है, बल्कि यह एक व्यापक और समग्र प्रक्रिया है, जिसके
माध्यम से विद्यालय द्वारा प्रदान किए जाने वाले सभी शैक्षिक अनुभवों की योजना
बनाई जाती है। इसमें केवल कक्षा में पढ़ाई जाने वाली औपचारिक सामग्री ही शामिल
नहीं होती, बल्कि सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ, जैसे खेलकूद, नाट्य-कलाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामाजिक कार्य और मूल्य आधारित शिक्षा
भी इसका हिस्सा होती हैं। पाठ्यचर्या का अभिकल्पन इस दृष्टि से किया जाता है कि
छात्रों का
शैक्षणिक, सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक विकास समान रूप से हो। यह प्रक्रिया सुनिश्चित
करती है कि शिक्षा न केवल ज्ञानार्जन का माध्यम बने, बल्कि
छात्रों को
सामाजिक
जिम्मेदारी,
समस्या-समाधान
कौशल और रचनात्मक क्षमता विकसित
करने में भी सहायक बने।
(ii) पाठ्यचर्या अभिकल्पन के प्रमुख आधार (Major Bases of
Curriculum Designing):
1. शैक्षिक दर्शन (Educational Philosophy):
पाठ्यचर्या अभिकल्पन का सबसे मूल और
सैद्धांतिक आधार शैक्षिक दर्शन होता है, क्योंकि
दर्शन यह निर्धारित करता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य क्या है और शिक्षार्थी को
किस प्रकार का व्यक्ति बनाया जाना है।
आदर्शवाद (Idealism) शिक्षा को नैतिकता, चरित्र निर्माण, सत्य, सुंदरता और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ता है। इस दर्शन पर
आधारित पाठ्यचर्या में साहित्य, दर्शन, नैतिक शिक्षा और शास्त्रीय विषयों को
प्रमुख स्थान दिया जाता है।
प्राकृतिकवाद (Naturalism) शिक्षा को प्रकृति के नियमों और बालक के
स्वाभाविक विकास से जोड़ता है। इसमें पाठ्यचर्या को बालक-केंद्रित, अनुभव-आधारित और स्वतंत्र वातावरण में
सीखने योग्य बनाया जाता है।
प्रयोजनवाद (Pragmatism) शिक्षा को जीवन की वास्तविक समस्याओं से
जोड़ता है। इस दर्शन के अनुसार पाठ्यचर्या व्यावहारिक, उपयोगितावादी और समस्या-समाधान आधारित
होती है।
रचनावाद (Constructivism) मानता है कि ज्ञान शिक्षक द्वारा नहीं, बल्कि शिक्षार्थी द्वारा अपने अनुभवों
के माध्यम से निर्मित किया जाता है। अतः इस दर्शन पर आधारित पाठ्यचर्या संवाद, खोज, प्रयोग
और सहयोगात्मक अधिगम को प्रोत्साहित करती है।
इस प्रकार शैक्षिक दर्शन पाठ्यचर्या की
दिशा, स्वरूप, विषय-वस्तु और शिक्षण-विधियों को गहराई से प्रभावित करता है।
2. सामाजिक आवश्यकताएँ (Social Needs):
पाठ्यचर्या अभिकल्पन का एक महत्वपूर्ण
आधार समाज की बदलती हुई आवश्यकताएँ होती हैं। शिक्षा किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के विकास का माध्यम
होती है।
समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय, समानता, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक
संरक्षण और सामाजिक सहयोग को बनाए रखने के लिए पाठ्यचर्या में इन मूल्यों का
समावेश किया जाता है।
औद्योगीकरण, वैश्वीकरण, तकनीकी विकास और सामाजिक परिवर्तन के
संदर्भ में पाठ्यचर्या को ऐसा बनाया जाता है कि छात्र सामाजिक समस्याओं को समझ सकें
और उनके समाधान में सक्रिय भूमिका निभा सकें। इस प्रकार सामाजिक आवश्यकताओं पर आधारित
पाठ्यचर्या शिक्षा को समाजोपयोगी बनाती है और जिम्मेदार नागरिकों के निर्माण में
सहायक होती है।
3. शिक्षार्थी की आवश्यकताएँ (Learner’s Needs):
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षार्थी
को पाठ्यचर्या का केंद्र माना जाता है। इसलिए पाठ्यचर्या अभिकल्पन करते समय
छात्रों की आयु, रुचि, क्षमता,
मानसिक स्तर, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और सीखने
की शैली को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है।
यदि पाठ्यचर्या शिक्षार्थियों की
आवश्यकताओं के अनुरूप होती है, तो
अधिगम अधिक प्रभावी, रोचक और स्थायी बनता है। विविध क्षमता वाले छात्रों के लिए लचीली, समावेशी और भिन्न-भिन्न स्तरों पर सीखने
की सुविधा देने वाली पाठ्यचर्या विकसित की जाती है। इस आधार पर निर्मित पाठ्यचर्या न केवल
छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि बढ़ाती है, बल्कि
उनके आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास में भी योगदान देती है।
4. राष्ट्रीय लक्ष्य (National Goals):
पाठ्यचर्या अभिकल्पन का उद्देश्य केवल
व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण भी होता है।
इसलिए इसे राष्ट्रीय लक्ष्यों और नीतियों के अनुरूप तैयार किया जाता है।
भारतीय संदर्भ में संविधान के मूल मूल्य—लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, समानता और न्याय—पाठ्यचर्या का अभिन्न अंग होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय एकता, वैश्विक नागरिकता और सामाजिक सद्भाव
जैसे उद्देश्यों को पाठ्यचर्या के माध्यम से छात्रों में विकसित किया जाता है। इस प्रकार पाठ्यचर्या राष्ट्र के
वर्तमान और भविष्य दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन बनती है।
(iii) पाठ्यचर्या अभिकल्पन की प्रमुख विधियाँ (Major
Approaches to Curriculum Designing):
1. विषय-केंद्रित पाठ्यचर्या (Subject-Centered Curriculum):
इस विधि में पाठ्यचर्या का आधार
पारंपरिक विषयों और ज्ञान की संरचना होती है। विषयों को तार्किक क्रम और
अनुशासनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को
सैद्धांतिक, गहन और व्यवस्थित ज्ञान प्रदान करना
होता है। यद्यपि यह विधि ज्ञान के संरक्षण और
प्रसार में प्रभावी है, फिर भी इसमें छात्रों की व्यक्तिगत
रुचियों और अनुभवों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता है। यह पद्धति पारंपरिक विद्यालयी शिक्षा और
प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।
2. शिक्षार्थी-केंद्रित पाठ्यचर्या (Learner-Centered Curriculum):
इस दृष्टिकोण में शिक्षार्थी की आवश्यकताओं, रुचियों और क्षमताओं को सर्वोपरि माना जाता है। पाठ्यचर्या को इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि छात्र सक्रिय रूप से सीखने की प्रक्रिया में भाग लें और स्वयं ज्ञान का निर्माण करें। यह विधि रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है। आधुनिक शिक्षा में इस दृष्टिकोण को अधिक प्रभावी और मनोवैज्ञानिक रूप से उपयुक्त माना जाता है।
3. गतिविधि-आधारित पाठ्यचर्या (Activity-Based Curriculum):
इस विधि में अधिगम को क्रियात्मक और
अनुभवात्मक गतिविधियों के माध्यम से सशक्त बनाया जाता है। प्रयोग, परियोजना कार्य, समूह
चर्चा, खेल, नाटक, कला और समस्या-आधारित कार्य इस
पाठ्यचर्या का अभिन्न हिस्सा होते हैं। इससे छात्रों में सीखने के प्रति रुचि बढ़ती है और ज्ञान केवल
सैद्धांतिक न रहकर व्यावहारिक बनता है। यह दृष्टिकोण “करके
सीखने” (Learning by
Doing) के
सिद्धांत पर आधारित है।
4. अनुभव-आधारित
और समन्वित पाठ्यचर्या (Experience-Based and Integrated Curriculum):
इस विधि में छात्रों
के जीवन अनुभवों और सामाजिक संदर्भों को पाठ्यचर्या से जोड़ा जाता है। विभिन्न विषयों को अलग-अलग न पढ़ाकर आपस में समन्वित रूप में
प्रस्तुत किया जाता है, जिससे ज्ञान समग्र और अर्थपूर्ण बनता है। यह पाठ्यचर्या छात्रों को जीवनोपयोगी कौशल, सामाजिक समझ और
व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करती है। इससे शिक्षा
बहुआयामी और वास्तविक जीवन से जुड़ी हुई बनती है।
(iv) पाठ्यचर्या अभिकल्पन की विशेषताएँ (Characteristics
of Curriculum Designing):
1. व्यापक
और लचीली (Comprehensive and Flexible):
एक प्रभावी पाठ्यचर्या का स्वरूप व्यापक
होता है, क्योंकि इसमें केवल विषयगत ज्ञान ही
नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक विकास से संबंधित सभी पहलुओं को सम्मिलित
किया जाता है। ऐसी पाठ्यचर्या ज्ञान, कौशल, मूल्य, दृष्टिकोण तथा अनुभवों का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करती है, जिससे शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास
संभव हो सके। इसके साथ ही पाठ्यचर्या का लचीला होना
अत्यंत आवश्यक है, ताकि समय, समाज,
विज्ञान और तकनीक में होने वाले
परिवर्तनों के अनुरूप उसमें आवश्यक संशोधन किए जा सकें। लचीलापन पाठ्यचर्या को
स्थिर न बनाकर गतिशील बनाता है, जिससे
यह बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं और शिक्षार्थियों की विविधताओं के अनुसार स्वयं को
अनुकूलित कर सके।
2. जीवन और समाज से जुड़ी (Life and Society-Oriented):
पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को
वास्तविक जीवन और सामाजिक संदर्भों से जोड़ना होता है। जब पाठ्यचर्या जीवन की
समस्याओं, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक
अनुभवों से संबंधित होती है, तब
अधिगम अधिक अर्थपूर्ण और प्रभावी बनता है। जीवन और समाज से जुड़ी पाठ्यचर्या छात्रों को केवल सैद्धांतिक
ज्ञान प्रदान नहीं करती, बल्कि उन्हें सामाजिक उत्तरदायित्वों, नागरिक कर्तव्यों और व्यावहारिक
चुनौतियों के प्रति सजग बनाती है। ऐसी शिक्षा छात्रों को समाज में सक्रिय, जागरूक और उपयोगी नागरिक के रूप में
विकसित करने में सहायक होती है।
3. मूल्य एवं कौशल-उन्मुख (Value and Skill-Oriented):
आधुनिक पाठ्यचर्या की एक महत्वपूर्ण
विशेषता यह है कि वह केवल सूचनाओं और तथ्यों के संप्रेषण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मूल्यों और कौशलों के विकास पर भी
विशेष बल देती है।
नैतिक मूल्य, सामाजिक संवेदनशीलता, सहयोग, सहिष्णुता और जिम्मेदारी जैसे गुण पाठ्यचर्या के माध्यम से
छात्रों में विकसित किए जाते हैं। साथ ही व्यावहारिक और जीवनोपयोगी कौशल जैसे
निर्णय-निर्माण, समस्या-समाधान, संप्रेषण और नेतृत्व क्षमता का विकास भी
किया जाता है। इस प्रकार मूल्य एवं कौशल-उन्मुख
पाठ्यचर्या छात्रों को न केवल योग्य विद्यार्थी, बल्कि सक्षम और जिम्मेदार नागरिक बनाने में योगदान देती है।
4. सतत मूल्यांकन पर आधारित (Continuous Assessment-Based):
आधुनिक पाठ्यचर्या में मूल्यांकन को
केवल अंतिम परीक्षा तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि
अधिगम की पूरी प्रक्रिया के दौरान निरंतर मूल्यांकन पर बल दिया जाता है। सतत मूल्यांकन से शिक्षार्थियों की
प्रगति, उपलब्धियों और कठिनाइयों का समय-समय पर
आकलन किया जा सकता है। इससे शिक्षक शिक्षण-विधियों में आवश्यक सुधार कर सकते हैं
और छात्र अपनी सीखने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। यह प्रणाली परीक्षा-केंद्रित शिक्षा की
कमियों को दूर करती है और शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी, संतुलित और छात्र-हितैषी बनाती है।
4. पाठ्यक्रम का अभिकल्पन (Designing of
Syllabus):
(i) पाठ्यक्रम अभिकल्पन का अर्थ:
पाठ्यक्रम का अभिकल्पन पाठ्यचर्या की व्यापक और समग्र संरचना
के अंतर्गत किसी विशेष कक्षा,
शैक्षिक स्तर अथवा विषय के लिए
विषयवस्तु, शैक्षिक उद्देश्यों तथा अधिगम अनुभवों
को स्पष्ट, सीमित, तार्किक
और क्रमबद्ध रूप में नियोजित करने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया
का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि शिक्षण-अधिगम कार्य पूर्व नियोजित, उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी ढंग से संपन्न
हो सके। पाठ्यक्रम अभिकल्पन के अंतर्गत यह
निर्णय लिया जाता है कि विद्यार्थियों को कौन-सा
ज्ञान प्रदान किया जाए,
उस
ज्ञान की मात्रा क्या हो,
विषयवस्तु
को किस क्रम में प्रस्तुत किया जाए तथा उसे किस स्तर तक पढ़ाया जाए। इसके साथ-साथ यह भी निर्धारित किया
जाता है कि शिक्षण-अधिगम गतिविधियाँ किस प्रकार संचालित होंगी और छात्रों को किस
प्रकार के अनुभव प्रदान किए जाएंगे।
इस प्रकार पाठ्यक्रम अभिकल्पन शिक्षकों को शिक्षण प्रक्रिया
में स्पष्ट दिशा,
योजना और संगठन प्रदान करता है, जिससे उनका शिक्षण अधिक व्यवस्थित और
प्रभावी बनता है। वहीं दूसरी ओर,
यह छात्रों को संगठित, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण अधिगम अनुभव
उपलब्ध कराता है,
जिससे उनका बौद्धिक, भावनात्मक और कौशलात्मक विकास सुनिश्चित
होता है तथा सीखना अधिक सार्थक और परिणामोन्मुख बनता है।
(ii) पाठ्यक्रम अभिकल्पन के प्रमुख तत्व:
1. उद्देश्यों
का निर्धारण:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन का पहला, मूलभूत और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व
शैक्षिक उद्देश्यों का स्पष्ट तथा व्यावहारिक निर्धारण है। उद्देश्य यह स्पष्ट
करते हैं कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात विद्यार्थी ज्ञान, समझ, दृष्टिकोण
और कौशल के स्तर पर किस प्रकार की उपलब्धि प्राप्त करेंगे।
ये उद्देश्य केवल ज्ञानात्मक उपलब्धि तक
सीमित नहीं होते, बल्कि संज्ञानात्मक (ज्ञान एवं समझ), भावात्मक (मूल्य, अभिवृत्ति और संवेदनशीलता) तथा
क्रियात्मक (कौशल एवं व्यवहार)—तीनों
क्षेत्रों से संबंधित होते हैं। स्पष्ट
और यथार्थवादी उद्देश्यों के निर्धारण से शिक्षण प्रक्रिया उद्देश्यपूर्ण बनती है
तथा शिक्षक और छात्र दोनों को यह ज्ञात रहता है कि अधिगम की दिशा और लक्ष्य क्या
हैं।
2. विषयवस्तु
का चयन:
उद्देश्यों के अनुरूप उपयुक्त विषयवस्तु
का चयन पाठ्यक्रम अभिकल्पन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील चरण है। चयनित
विषयवस्तु ऐसी होनी चाहिए जो शैक्षिक दृष्टि से सार्थक, सामाजिक रूप से उपयोगी, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणिक तथा
शिक्षार्थियों की आयु, रुचि और मानसिक स्तर के अनुरूप हो। विषयवस्तु के चयन में यह ध्यान रखा जाता
है कि उसमें अनावश्यक तथ्यों की अधिकता न हो, बल्कि
ऐसी सामग्री सम्मिलित हो जो छात्रों की ज्ञान-वृद्धि, समझ के विकास और व्यावहारिक कौशलों को सुदृढ़ करे। उचित विषयवस्तु पाठ्यक्रम को बोझिल होने
से बचाती है और अधिगम को अर्थपूर्ण बनाती है।
3. विषयवस्तु
का संगठन और क्रम:
चयनित विषयवस्तु को प्रभावी अधिगम हेतु
तार्किक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टिकोण से
सुव्यवस्थित करना आवश्यक होता है। विषयों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया जाता है कि
छात्र अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर नए ज्ञान को सहजता से ग्रहण कर सकें।
उचित संगठन और क्रम से विषयवस्तु में
निरंतरता बनी रहती है और अधिगम प्रक्रिया में स्पष्टता आती है।
इससे सीखना सरल, रोचक और स्थायी बनता है तथा छात्रों में
विषय के प्रति आत्मविश्वास और रुचि विकसित होती है।
4. समय निर्धारण:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन में प्रत्येक इकाई, अध्याय या विषय के लिए उपयुक्त और
संतुलित समय का निर्धारण किया जाता है। समय निर्धारण का उद्देश्य यह सुनिश्चित
करना होता है कि संपूर्ण पाठ्यक्रम निर्धारित शैक्षिक अवधि में बिना किसी दबाव के
पूर्ण किया जा सके। इससे न तो किसी विषय को आवश्यकता से
अधिक समय दिया जाता है और न ही किसी महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा होती है।
समय निर्धारण शिक्षकों को पाठ योजना
बनाने में सहायता करता है तथा छात्रों में अध्ययन की नियमितता और अनुशासन बनाए
रखने में सहायक सिद्ध होता है।
5. मूल्यांकन की व्यवस्था:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन का अंतिम किंतु
अत्यंत आवश्यक तत्व मूल्यांकन की योजना है। मूल्यांकन के माध्यम से छात्रों की
अधिगम उपलब्धियों, समझ, कौशल
और व्यवहार में आए परिवर्तनों का आकलन किया जाता है।
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार यह
मूल्यांकन केवल अंतिम परीक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सतत और व्यापक होना चाहिए।
उद्देश्यों के अनुरूप किया गया
मूल्यांकन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की प्रभावशीलता को स्पष्ट करता है और आवश्यक
सुधारों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।
(iii) पाठ्यक्रम
अभिकल्पन के सिद्धांत (Principles of
Syllabus Designing)
• ज्ञात से अज्ञात तक:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन का यह एक मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसके अनुसार शिक्षण की शुरुआत छात्रों के पूर्व ज्ञान, अनुभव और समझ से की जाती है तथा धीरे-धीरे उन्हें नए और अपरिचित ज्ञान की ओर ले जाया जाता है। जब नया ज्ञान पहले से ज्ञात तथ्यों से जुड़ता है, तो अधिगम अधिक स्वाभाविक, सहज और स्थायी बनता है। यह सिद्धांत छात्रों में विषय के प्रति रुचि बनाए रखने के साथ-साथ सीखने में आने वाली कठिनाइयों को भी कम करता है।
• सरल से जटिल तक:
इस सिद्धांत के अनुसार पाठ्यक्रम में
विषयवस्तु को सरल और बुनियादी अवधारणाओं से आरंभ कर क्रमशः जटिल और उच्च स्तरीय
अवधारणाओं की ओर बढ़ाया जाता है। इससे छात्र बिना मानसिक दबाव के
धीरे-धीरे विषय की गहराई को समझ पाते हैं। सरल से जटिल की क्रमबद्धता
शिक्षार्थियों में आत्मविश्वास, तार्किक
सोच और विषय की स्पष्ट समझ विकसित करने में सहायक होती है।
• ठोस से अमूर्त तक:
इस सिद्धांत में शिक्षण की शुरुआत ठोस, प्रत्यक्ष और अनुभव आधारित उदाहरणों से
की जाती है, जिनका संबंध छात्रों के दैनिक जीवन से
होता है। इसके पश्चात धीरे-धीरे अमूर्त, सैद्धांतिक और जटिल अवधारणाओं को
प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रक्रिया छात्रों की कल्पनाशक्ति और
बौद्धिक क्षमता को क्रमिक रूप से विकसित करती है तथा सीखने को अधिक प्रभावी और
स्थायी बनाती है।
• जीवनोपयोगिता पर जोर:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन का एक महत्वपूर्ण
सिद्धांत यह है कि विषयवस्तु का सीधा संबंध वास्तविक जीवन की समस्याओं, सामाजिक परिस्थितियों और व्यावहारिक
आवश्यकताओं से होना चाहिए। जब छात्र यह अनुभव करते हैं कि सीखा हुआ
ज्ञान उनके दैनिक जीवन में उपयोगी है, तो
उनकी सीखने की प्रेरणा बढ़ती है। इस सिद्धांत के माध्यम से शिक्षा को
पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर जीवन-कौशल विकसित करने का माध्यम बनाया जाता है।
• संतुलन और निरंतरता:
पाठ्यक्रम अभिकल्पन में ज्ञान, कौशल और मूल्यों के बीच संतुलन बनाए
रखना अत्यंत आवश्यक होता है। साथ ही विभिन्न कक्षाओं, स्तरों और इकाइयों में विषयवस्तु की
तार्किक निरंतरता सुनिश्चित की जाती है, ताकि
अधिगम क्रमिक और समन्वित रूप से आगे बढ़ सके।
संतुलन और निरंतरता से पाठ्यक्रम न तो
बोझिल बनता है और न ही बिखरा हुआ, बल्कि
यह शिक्षार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होता है।
(iv) आधुनिक पाठ्यक्रम अभिकल्पन की विशेषताएँ (Characteristics
of Modern Syllabus Designing):
• शिक्षार्थी-केंद्रित
दृष्टिकोण:
आधुनिक पाठ्यक्रम अभिकल्पन का मूल आधार
शिक्षार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण है, जिसमें
छात्र को संपूर्ण शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का केंद्र माना जाता है।
इस दृष्टिकोण के अंतर्गत पाठ्यक्रम का
निर्माण छात्रों की रुचियों, क्षमताओं, आवश्यकताओं, पूर्व ज्ञान तथा सीखने की विभिन्न
शैलियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। इससे छात्र निष्क्रिय श्रोता न रहकर सक्रिय सहभागी बनते हैं और
स्वयं के अनुभवों के माध्यम से ज्ञान का निर्माण करते हैं।
शिक्षार्थी-केंद्रित पाठ्यक्रम
आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और स्व-अधिगम की प्रवृत्ति
को विकसित करने में सहायक होता है।
• अंतःविषयक (Interdisciplinary) एकीकरण:
आधुनिक पाठ्यक्रम में विभिन्न विषयों को
अलग-अलग और खंडित रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनमें आपसी संबंध और समन्वय
स्थापित किया जाता है। अंतःविषयक एकीकरण के माध्यम से छात्र यह
समझ पाते हैं कि विभिन्न विषय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और वास्तविक जीवन की
समस्याएँ किसी एक विषय तक सीमित नहीं होतीं।
इससे ज्ञान समग्र, व्यापक और अर्थपूर्ण बनता है तथा
छात्रों में समन्वित चिंतन और विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास होता है।
• कौशल और दक्षता-आधारित शिक्षा:
आधुनिक पाठ्यक्रम अभिकल्पन केवल
सैद्धांतिक ज्ञान के संप्रेषण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यावहारिक कौशल और दक्षताओं के विकास पर विशेष बल देता
है। इसमें
समस्या-समाधान, निर्णय-निर्माण, संप्रेषण, सहयोग,
नेतृत्व और तकनीकी कौशल जैसे जीवनोपयोगी
कौशलों को प्रमुख स्थान दिया जाता है। कौशल-आधारित शिक्षा छात्रों को
आत्मनिर्भर, रोजगारोन्मुख और भविष्य की चुनौतियों का
सामना करने में सक्षम बनाती है।
• रटंत और यांत्रिक शिक्षा से मुक्त:
आधुनिक पाठ्यक्रम रटने और यांत्रिक
अभ्यास पर आधारित पारंपरिक शिक्षा पद्धति को हतोत्साहित करता है।
इसके स्थान पर समझ, चिंतन, तर्क,
विश्लेषण और रचनात्मकता को प्रोत्साहित
किया जाता है। जब छात्र विषयवस्तु को समझकर सीखते हैं
और उसे अपने अनुभवों से जोड़ते हैं, तब
अधिगम अधिक गहन, स्थायी और सार्थक बनता है।
इस प्रकार आधुनिक पाठ्यक्रम छात्रों में
मौलिक सोच और नवाचार की क्षमता का विकास करता है।
5.
पाठ्य-पुस्तकों का अभिकल्पन (Designing of Text Books)
(i) पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन का अर्थ
पाठ्य-पुस्तक का अभिकल्पन एक सुविचारित और योजनाबद्ध शैक्षिक
प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयवस्तु
को इस प्रकार रूपांतरित किया जाता है कि वह शिक्षण-अधिगम के लिए सहज, प्रभावी और आकर्षक बन सके। पाठ्य-पुस्तक
अभिकल्पन का उद्देश्य केवल विषयवस्तु को प्रस्तुत करना नहीं होता, बल्कि उसे शिक्षार्थियों की आयु, मानसिक स्तर, रुचि और बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप
ढालना भी होता है। इस प्रक्रिया में भाषा की सरलता, उदाहरणों की प्रासंगिकता, चित्रों और गतिविधियों की उपयुक्तता तथा
सीखने की क्रमबद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। एक अच्छी तरह से अभिकल्पित
पाठ्य-पुस्तक शिक्षक को शिक्षण में मार्गदर्शन प्रदान करती है और शिक्षार्थियों को
स्वाध्याय के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन शिक्षण-अधिगम
प्रक्रिया को अधिक प्रभावी,
संवादात्मक और उद्देश्यपूर्ण बनाता है।
(ii) पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन के प्रमुख सिद्धांत
1. पाठ्यक्रम
के अनुरूपता
पाठ्य-पुस्तक का अभिकल्पन सदैव
निर्धारित पाठ्यक्रम की रूपरेखा, उद्देश्यों, विषयवस्तु तथा अपेक्षित अधिगम परिणामों
(Learning Outcomes) के पूर्णतः अनुरूप होना चाहिए।
पाठ्यक्रम यह निर्धारित करता है कि किसी विशेष कक्षा या स्तर पर विद्यार्थियों को
क्या, कितना और किस उद्देश्य से पढ़ाया जाना
है। यदि पाठ्य-पुस्तक की विषयवस्तु पाठ्यक्रम से भिन्न या उससे अधिक-कम हो जाती है, तो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में असंतुलन
और भ्रम उत्पन्न हो सकता है। अतः
पाठ्य-पुस्तक में वही अवधारणाएँ, तथ्य, कौशल और गतिविधियाँ सम्मिलित की जानी
चाहिए जो पाठ्यक्रम द्वारा निर्धारित हों। इससे शिक्षक को शिक्षण में स्पष्ट दिशा
मिलती है तथा विद्यार्थियों का अधिगम लक्ष्य-उन्मुख, व्यवस्थित और मूल्यांकन-संगत बनता है।
2. भाषा
की सरलता और स्पष्टता
पाठ्य-पुस्तक की भाषा शिक्षार्थियों की
आयु, मानसिक स्तर और बौद्धिक क्षमता के
अनुरूप सरल, स्पष्ट और सहज होनी चाहिए। जटिल
शब्दावली, कठिन व्याकरणिक संरचना और अनावश्यक
तकनीकी शब्दों का अत्यधिक प्रयोग विद्यार्थियों के लिए विषयवस्तु को बोझिल बना
देता है। सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा न केवल समझ को
आसान बनाती है, बल्कि विद्यार्थियों में पढ़ने की रुचि
भी उत्पन्न करती है। स्पष्ट भाषा के माध्यम से शिक्षार्थी विषयवस्तु को आत्मसात कर
पाते हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास, स्वाध्याय की प्रवृत्ति तथा सीखने के
प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
3. बालक-अनुकूल
प्रस्तुति
पाठ्य-पुस्तक की प्रस्तुति शिक्षार्थी-केंद्रित
और बालक-अनुकूल होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि विषयवस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत
किया जाए कि वह बच्चों के लिए आकर्षक, रोचक
और सहज बोधगम्य हो। रोचक शीर्षक, उपशीर्षक, उपयुक्त अनुच्छेद विभाजन, रंगों का संतुलित प्रयोग तथा सुंदर
लेआउट पाठ्य-पुस्तक को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
बालक-अनुकूल प्रस्तुति से विद्यार्थी
पुस्तक से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं और सीखने की प्रक्रिया आनंददायक बन जाती
है। इससे अधिगम को बोझ समझने की प्रवृत्ति समाप्त होती है और छात्र स्वप्रेरणा से
अध्ययन करने के लिए उत्साहित होते हैं।
4. चित्र, तालिका और उदाहरणों का प्रयोग
पाठ्य-पुस्तक में चित्रों, तालिकाओं, चार्ट,
मानचित्रों तथा रेखाचित्रों का उपयुक्त
और संतुलित प्रयोग अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से अमूर्त, जटिल और सैद्धांतिक अवधारणाओं को समझाने
में दृश्य सामग्री महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों का प्रयोग
विषयवस्तु को अधिक व्यावहारिक और अर्थपूर्ण बनाता है। जब विद्यार्थी किसी अवधारणा
को अपने अनुभवों से जोड़ पाते हैं, तो
अधिगम अधिक प्रभावी, स्थायी और स्मरणीय हो जाता है। इस
प्रकार दृश्य और उदाहरणात्मक प्रस्तुति सीखने की गुणवत्ता को बढ़ाती है।
5. गतिविधि
और अभ्यास का समावेश
आधुनिक पाठ्य-पुस्तकों में केवल
वर्णनात्मक सामग्री ही नहीं, बल्कि
विभिन्न प्रकार की गतिविधियों, अभ्यास
प्रश्नों, परियोजनाओं और आत्ममूल्यांकन अभ्यासों
का समावेश होना चाहिए। इससे विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता न रहकर सक्रिय सहभागी
बनते हैं। गतिविधियाँ विद्यार्थियों को सोचने, प्रयोग करने, चर्चा करने और निष्कर्ष निकालने का अवसर
प्रदान करती हैं। अभ्यास प्रश्नों और परियोजनाओं के माध्यम से विद्यार्थी अपने
ज्ञान की जाँच कर पाते हैं तथा सीखे गए ज्ञान का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना
सीखते हैं। इससे अधिगम अधिक गहन और व्यवहारिक बनता है।
6. मूल्य
और संवेदनशीलता का ध्यान
पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन के दौरान नैतिक
मूल्यों, सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय
दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। पाठ्य-पुस्तक के माध्यम से
विद्यार्थियों में ईमानदारी, सहयोग, सहिष्णुता, राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक भावना तथा पर्यावरण संरक्षण
जैसे मूल्यों का विकास किया जा सकता है। मूल्य-आधारित विषयवस्तु शिक्षा को केवल
बौद्धिक विकास तक सीमित न रखकर चरित्र निर्माण का सशक्त माध्यम बनाती है। इससे विद्यार्थी
संवेदनशील, जिम्मेदार और जागरूक नागरिक के रूप में
विकसित होते हैं, जो समाज और राष्ट्र के निर्माण में
सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।
(iii) आधुनिक पाठ्य-पुस्तकों की विशेषताएँ
1. संवादात्मक और रचनात्मक शैली
आधुनिक पाठ्य-पुस्तकें एकतरफा जानकारी
देने के बजाय संवादात्मक शैली को अपनाती हैं। इनमें प्रश्न-उत्तर, सोचिए-समझिए, चर्चा कीजिए जैसे खंड सम्मिलित होते हैं, जो विद्यार्थियों को विषयवस्तु के साथ
सक्रिय संवाद स्थापित करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह शैली शिक्षार्थियों को
केवल पाठ पढ़ने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि
उन्हें विचार करने, कल्पना करने और अपने विचार व्यक्त करने
का अवसर प्रदान करती है। रचनात्मक प्रस्तुति के माध्यम से
पाठ्य-पुस्तकें छात्रों की कल्पनाशक्ति, अभिव्यक्ति
क्षमता और नवाचार प्रवृत्ति को विकसित करती हैं। इससे सीखने की प्रक्रिया रोचक, आनंददायक और प्रभावी बनती है।
2. गतिविधि और परियोजना-आधारित शिक्षण
आधुनिक पाठ्य-पुस्तकों में
गतिविधि-आधारित और परियोजना-आधारित शिक्षण पर विशेष बल दिया जाता है। विभिन्न
प्रकार की गतिविधियाँ, जैसे समूह-कार्य, प्रयोग, सर्वेक्षण, भूमिका-अभिनय
और परियोजनाएँ विद्यार्थियों को सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सम्मिलित
करती हैं। इस प्रकार का शिक्षण छात्रों को ‘करके सीखने’ (Learning by Doing) का अवसर प्रदान करता है। इससे न केवल
विषयवस्तु की समझ गहरी होती है, बल्कि
सहयोग, नेतृत्व, समस्या-समाधान और समय-प्रबंधन जैसे जीवनोपयोगी कौशलों का भी
विकास होता है।
3. स्थानीय और वैश्विक संदर्भों का समावेश
आधुनिक पाठ्य-पुस्तकें विषयवस्तु को
स्थानीय परिवेश, संस्कृति और सामाजिक अनुभवों से जोड़ती
हैं, ताकि विद्यार्थी अपने आसपास की दुनिया
को बेहतर ढंग से समझ सकें। साथ ही, इनमें
वैश्विक संदर्भों, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं और समकालीन
मुद्दों को भी सम्मिलित किया जाता है। स्थानीय
और वैश्विक दोनों दृष्टिकोणों का समावेश विद्यार्थियों में व्यापक सोच और वैश्विक
नागरिकता की भावना विकसित करता है। इससे छात्र अपने समाज के साथ-साथ विश्व समुदाय
के प्रति भी जागरूक और उत्तरदायी बनते हैं।
4. आलोचनात्मक चिंतन और समस्या-समाधान कौशल
को प्रोत्साहित करना
आधुनिक पाठ्य-पुस्तकें केवल तथ्यों को
रटने पर बल नहीं देतीं, बल्कि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक
चिंतन (Critical
Thinking) और
समस्या-समाधान कौशल के विकास को प्रोत्साहित करती हैं। इसमें खुले प्रश्न, विचार-उत्तेजक गतिविधियाँ और वास्तविक
जीवन से जुड़े समस्यात्मक प्रसंग सम्मिलित किए जाते हैं। इनके माध्यम से विद्यार्थी तथ्यों का
विश्लेषण करना, विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना करना और
तार्किक निष्कर्ष निकालना सीखते हैं। इससे उनका बौद्धिक विकास होता है और वे जीवन
की जटिल समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम बनते हैं।
6.
पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम
और पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन में पारस्परिक संबंध
शिक्षा की गुणवत्ता और प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है
कि पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक—ये तीनों घटक किस हद तक आपस में समन्वित
और परस्पर पूरक हैं। यद्यपि इन तीनों की प्रकृति और भूमिका भिन्न-भिन्न होती है, फिर भी ये एक-दूसरे से गहराई से जुड़े
हुए होते हैं और मिलकर शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सार्थक बनाते हैं।
(i) पाठ्यचर्या:
व्यापक ढाँचा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करती है
पाठ्यचर्या शिक्षा का सबसे व्यापक और
आधारभूत ढाँचा होती है। इसमें विद्यालय द्वारा प्रदान किए जाने वाले सभी शैक्षिक
अनुभवों—जैसे औपचारिक अध्ययन, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ, नैतिक शिक्षा, सामाजिक अनुभव, खेल, कला
और जीवन कौशल—का समावेश होता है।
पाठ्यचर्या यह निर्धारित करती है कि
शिक्षा का उद्देश्य क्या होगा, किन
मूल्यों और आदर्शों को विकसित किया जाना है तथा समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के
अनुरूप शिक्षण की दिशा क्या होगी। इस प्रकार पाठ्यचर्या शिक्षा की वैचारिक दृष्टि
और समग्र उद्देश्य को स्पष्ट करती है।
(ii) पाठ्यक्रम:
अकादमिक रूपरेखा, विषय और अनुक्रम तय करता है
पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण
और अधिक सीमित भाग होता है,
जो किसी विशेष कक्षा, स्तर या विषय के लिए निर्धारित अकादमिक
रूपरेखा प्रदान करता है। इसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि किन विषयों को पढ़ाया
जाएगा, विषयवस्तु की सीमा क्या होगी और उसे किस
क्रम में प्रस्तुत किया जाएगा। पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षण को
व्यवस्थित, क्रमबद्ध और समयबद्ध बनाया जाता है। यह
शिक्षकों को शिक्षण योजना बनाने में सहायता करता है तथा विद्यार्थियों को संगठित
और अनुशासित अधिगम अनुभव प्रदान करता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या के
उद्देश्यों को व्यवहार में लाने का माध्यम बनता है।
(iii) पाठ्य-पुस्तक: शिक्षण का व्यावहारिक और व्यवहारिक साधन
पाठ्य-पुस्तक पाठ्यक्रम को कक्षा-कक्ष
तक पहुँचाने का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक साधन होती है। इसमें पाठ्यक्रम में
निर्धारित विषयवस्तु को सरल, स्पष्ट, रोचक और शिक्षण-योग्य रूप में प्रस्तुत
किया जाता है। पाठ्य-पुस्तक शिक्षकों को अध्यापन में
सहायता प्रदान करती है तथा विद्यार्थियों को आत्मअध्ययन का अवसर देती है। इसमें
उदाहरण, चित्र, गतिविधियाँ, अभ्यास
प्रश्न और परियोजनाएँ सम्मिलित होती हैं, जो
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी और अर्थपूर्ण बनाती हैं।
तीनों का अभिकल्पन परस्पर पूरक और समन्वित होना आवश्यक है, ताकि शिक्षा संगठित, उद्देश्यपूर्ण और जीवनोपयोगी हो।
7.
अभिकल्पन में समकालीन प्रवृत्तियाँ
वर्तमान समय में शिक्षा प्रणाली तीव्र सामाजिक, तकनीकी और आर्थिक परिवर्तनों से गुजर रही है।
इन परिवर्तनों का प्रभाव पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम
और पाठ्य-पुस्तक के अभिकल्पन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आधुनिक अभिकल्पन
अब केवल विषयवस्तु के चयन तक सीमित न रहकर शिक्षार्थी के समग्र विकास, जीवन-कौशल, नवाचार
और वैश्विक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। अभिकल्पन में उभरती
समकालीन प्रवृत्तियाँ शिक्षा को अधिक प्रासंगिक, लचीली और प्रभावी बनाती हैं।
(i) शिक्षार्थी-केंद्रित
अभिकल्पन
समकालीन अभिकल्पन की सबसे महत्वपूर्ण प्रवृत्ति शिक्षार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण है। इसमें शिक्षा की योजना शिक्षकों या विषयों के बजाय शिक्षार्थियों की रुचियों, क्षमताओं, आवश्यकताओं, पृष्ठभूमि और सीखने की गति को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इस दृष्टिकोण में शिक्षार्थी को निष्क्रिय श्रोता न मानकर अधिगम प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी माना जाता है। गतिविधियाँ, परियोजनाएँ, समूह कार्य और चर्चा आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे छात्रों में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और सीखने की रुचि विकसित होती है।
(ii) रचनावादी
(Constructivist) दृष्टिकोण
रचनावादी दृष्टिकोण के अनुसार ज्ञान को
सीधे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, बल्कि
शिक्षार्थी अपने अनुभवों और पूर्व ज्ञान के आधार पर स्वयं ज्ञान का निर्माण करता
है। समकालीन अभिकल्पन में इस सिद्धांत को विशेष महत्व दिया गया है।
इस दृष्टिकोण के अंतर्गत समस्या-आधारित
अधिगम, खोज-आधारित अधिगम और अनुभव-आधारित
गतिविधियों को पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाता है। इससे छात्रों
में आलोचनात्मक चिंतन, तर्क शक्ति और रचनात्मकता का विकास होता
है तथा अधिगम अधिक स्थायी और अर्थपूर्ण बनता है।
(iii) डिजिटल और ई-सामग्री का समावेश
सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के विकास के साथ-साथ अभिकल्पन में
डिजिटल और ई-सामग्री का समावेश एक प्रमुख समकालीन प्रवृत्ति बन गया है। ई-पुस्तकें, ऑनलाइन संसाधन, वीडियो लेक्चर, शैक्षिक ऐप्स, वर्चुअल कक्षाएँ और डिजिटल मूल्यांकन
उपकरण आधुनिक शिक्षा का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
डिजिटल सामग्री से शिक्षा अधिक सुलभ, लचीली और आकर्षक बनती है। इससे
शिक्षार्थी अपनी गति और रुचि के अनुसार सीख सकते हैं तथा स्व-अध्ययन और आजीवन
अधिगम को बढ़ावा मिलता है।
(iv) कौशल-आधारित
पाठ्यचर्या
समकालीन शिक्षा केवल सैद्धांतिक ज्ञान
तक सीमित न रहकर कौशल विकास पर विशेष बल देती है। आधुनिक अभिकल्पन में जीवन कौशल, संचार कौशल, समस्या-समाधान, निर्णय-क्षमता, नेतृत्व और तकनीकी दक्षताओं को
पाठ्यचर्या का अनिवार्य भाग बनाया जा रहा है।
कौशल-आधारित पाठ्यचर्या शिक्षार्थियों
को रोजगारोन्मुख बनाती है और उन्हें वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने में
सक्षम बनाती है। इससे शिक्षा और कार्य-जगत के बीच की दूरी कम होती है।
(v) बहुविषयक
(Multidisciplinary) और अंतःविषयक दृष्टिकोण
आधुनिक अभिकल्पन में विषयों को पृथक-पृथक
न पढ़ाकर उनके बीच आपसी संबंध स्थापित करने पर बल दिया जा रहा है। बहुविषयक
दृष्टिकोण में विभिन्न विषयों को एक साथ प्रस्तुत किया जाता है, जबकि अंतःविषयक दृष्टिकोण में विषयों के
बीच गहन समन्वय स्थापित किया जाता है। इस प्रवृत्ति से शिक्षार्थियों में
समग्र सोच विकसित होती है और वे किसी समस्या को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने में
सक्षम होते हैं। इससे ज्ञान अधिक व्यावहारिक, समन्वित
और जीवनोपयोगी बनता है।
8.
अभिकल्पन में चुनौतियाँ
यद्यपि आधुनिक शिक्षा में पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक अभिकल्पन को
अधिक प्रभावी, लचीला और शिक्षार्थी-केंद्रित बनाने के
प्रयास किए जा रहे हैं,
फिर भी व्यवहार में इसके समक्ष अनेक
व्यावहारिक और संरचनात्मक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। ये चुनौतियाँ अभिकल्पन की
गुणवत्ता, क्रियान्वयन और अपेक्षित शैक्षिक
परिणामों को प्रभावित करती हैं।
(i) विषयवस्तु की अधिकता और जटिलता
अभिकल्पन की एक प्रमुख चुनौती
पाठ्यवस्तु की अत्यधिक मात्रा और उसकी जटिलता है। अक्सर पाठ्यक्रम में बहुत अधिक
तथ्यों, अवधारणाओं और सूचनाओं को समाहित कर दिया
जाता है, जिससे शिक्षार्थियों पर मानसिक बोझ बढ़
जाता है। अधिक विषयवस्तु के कारण शिक्षक विषय को
गहराई से समझाने के बजाय केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करने पर केंद्रित हो जाते हैं। इससे
अधिगम सतही, यांत्रिक और रटंत प्रवृत्ति पर आधारित
हो जाता है तथा समझ और चिंतन का अपेक्षित विकास नहीं हो पाता।
(ii) समय और संसाधनों की सीमाएँ
अभिकल्पन के प्रभावी क्रियान्वयन में
समय और संसाधनों की सीमाएँ एक बड़ी बाधा हैं। सीमित शैक्षणिक सत्र, निर्धारित पाठ्यक्रम अवधि और
परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था के कारण शिक्षकों को नवाचार, गतिविधि-आधारित शिक्षण और अनुभवात्मक
अधिगम के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त कई विद्यालयों में
शिक्षण-सामग्री, डिजिटल संसाधन, प्रयोगशालाएँ और प्रशिक्षित मानव संसाधन
उपलब्ध नहीं होते। संसाधनों की यह कमी अभिकल्पन के उद्देश्यों और वास्तविक शिक्षण
अभ्यास के बीच अंतर उत्पन्न करती है।
(iii) शिक्षार्थियों की विविध पृष्ठभूमि और
क्षमता
आधुनिक कक्षा में शिक्षार्थी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और भाषाई दृष्टि से अत्यंत विविध होते हैं। उनकी
रुचियाँ, सीखने की गति, पूर्व ज्ञान और क्षमताएँ भी भिन्न-भिन्न
होती हैं। एक समान पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक सभी
शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप कुछ विद्यार्थी
पीछे रह जाते हैं, जबकि कुछ के लिए पाठ्यवस्तु कम
चुनौतीपूर्ण प्रतीत होती है। इस विविधता को संतुलित करना अभिकल्पन के लिए एक जटिल
चुनौती बन जाता है।
(iv) नीति
निर्धारण और क्रियान्वयन में अंतर
अभिकल्पन से संबंधित नीतियाँ और दिशानिर्देश
प्रायः उच्च स्तर पर तैयार किए जाते हैं, किंतु
उनका प्रभावी क्रियान्वयन विद्यालय स्तर तक समान रूप से नहीं हो पाता। नीति
निर्धारण और कक्षा-कक्ष की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर देखने को मिलता है।
शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण न मिलना, प्रशासनिक दबाव, परीक्षा-उन्मुख शिक्षा प्रणाली और
संसाधनों की कमी—ये सभी कारण नीति और व्यवहार के बीच
दूरी उत्पन्न करते हैं। इससे अभिकल्पन की मूल भावना और उद्देश्य पूरी तरह साकार
नहीं हो पाते।
9. शैक्षिक महत्व
पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक के
सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक अभिकल्पन का शिक्षा प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण
स्थान है। इनका शैक्षिक महत्व केवल विषयवस्तु के चयन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह संपूर्ण शिक्षण-अधिगम व्यवस्था
को प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और समाजोपयोगी बनाने में
सहायक होता है।
(i) अधिगम
को अधिक प्रभावी और अर्थपूर्ण बनाता है
सुनियोजित अभिकल्पन के माध्यम से अधिगम
को व्यवस्थित, क्रमबद्ध और शिक्षार्थी-अनुकूल बनाया
जाता है। जब विषयवस्तु को छात्रों की आयु, रुचि
और पूर्व ज्ञान के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है, तब सीखना केवल सूचना ग्रहण तक सीमित न रहकर समझ, चिंतन और अनुप्रयोग की ओर अग्रसर होता
है। इससे अधिगम अधिक गहन,
स्थायी और अर्थपूर्ण बनता है।
(ii) शिक्षण-अधिगम
प्रक्रिया को स्पष्ट दिशा और संरचना प्रदान करता है
अभिकल्पन शिक्षकों और शिक्षार्थियों दोनों को यह स्पष्टता प्रदान करता है कि क्या पढ़ाना है, कैसे पढ़ाना है और किस स्तर तक सीखने की अपेक्षा की जाती है। इससे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अनिश्चितता और अव्यवस्था समाप्त होती है। स्पष्ट उद्देश्यों, संगठित विषयवस्तु और उचित मूल्यांकन व्यवस्था के कारण शिक्षा अधिक प्रभावी और संतुलित बनती है।
(iii) शिक्षा को उद्देश्यपूर्ण और समाजोपयोगी बनाता है
सार्थक अभिकल्पन शिक्षा को केवल
परीक्षा-केंद्रित न रखकर समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ता है। इसमें
लोकतांत्रिक मूल्य, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय चेतना, राष्ट्रीय एकता और वैश्विक दृष्टिकोण
जैसे तत्वों का समावेश किया जाता है। परिणामस्वरूप शिक्षा समाज के विकास और
परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाने लगती है।
(iv) समग्र
व्यक्तित्व विकास, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी में
सहायक
अभिकल्पन के माध्यम से शिक्षा बौद्धिक
विकास के साथ-साथ भावात्मक,
नैतिक और सामाजिक विकास को भी बढ़ावा
देती है। विद्यार्थियों में सहयोग, सहिष्णुता, नेतृत्व, आत्मअनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे गुण विकसित होते
हैं। इस प्रकार शिक्षा व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का सशक्त माध्यम बनती है।