The role of such disciplinary areas like Language, Mathematics, Social Science, Science in the overall scheme of the School Curriculum (from Philosophical point of view John Dewey) विद्यालयी पाठ्यक्रम की समग्र संरचना में भाषा, गणित, सामाजिक विज्ञान एवं विज्ञान जैसे अनुशासनात्मक क्षेत्रों की भूमिका — दार्शनिक दृष्टिकोण से (जॉन डेवी के विचारों के संदर्भ में)
1.
प्रस्तावना (Introduction):
विद्यालयी
पाठ्यक्रम किसी भी शिक्षा प्रणाली का केंद्रीय आधार होता है, क्योंकि वही यह निर्धारित करता है कि
विद्यालय में किस प्रकार का ज्ञान, कौशल
और मूल्य बालकों को प्रदान किए जाएँगे। पाठ्यक्रम को केवल विभिन्न विषयों की सूची
मानना एक सीमित दृष्टिकोण होगा;
वास्तव में यह समाज की बदलती आवश्यकताओं, दार्शनिक विचारधाराओं और शिक्षा के
दीर्घकालिक उद्देश्यों का सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण प्रतिफल होता है। भाषा, गणित, सामाजिक
विज्ञान और विज्ञान जैसे अनुशासनात्मक क्षेत्र इस संरचना की नींव होते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से बालक न केवल
बौद्धिक क्षमताएँ अर्जित करता है,
बल्कि सामाजिक समझ, नैतिक चेतना और दैनिक जीवन से जुड़े
व्यावहारिक कौशल भी विकसित करता है। ये विषय बालक को सोचने, संवाद करने, समस्याओं का समाधान खोजने और अपने
परिवेश को समझने में सक्षम बनाते हैं।
प्रगतिशील शिक्षा के प्रमुख दार्शनिक जॉन डेवी ने पाठ्यक्रम को जीवन से पृथक किसी अमूर्त संरचना के रूप में नहीं, बल्कि मानव अनुभवों से जुड़ी एक सजीव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा। उनके अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल सूचनाओं का संप्रेषण नहीं है, बल्कि ऐसे अनुभवों का निर्माण करना है, जिनके माध्यम से शिक्षार्थी स्वतंत्र रूप से सोचना, तर्क करना और समाज में सक्रिय तथा जिम्मेदार भूमिका निभाना सीख सके। डेवी इस बात पर बल देते हैं कि सीखने की प्रक्रिया तभी सार्थक होती है, जब वह बालक के जीवन, सामाजिक वास्तविकताओं और सामूहिक गतिविधियों से जुड़ी हो। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में भाषा, गणित, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ये सभी अनुशासन बालक को अनुभव के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने, लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने और समाज के सक्रिय सदस्य के रूप में विकसित होने में सहायता प्रदान करते हैं।
2. जॉन डेवी का दार्शनिक दृष्टिकोण (Vision
of John Dewey):
जॉन डेवी का शैक्षिक और दार्शनिक दृष्टिकोण प्रायोगिक (Pragmatism) और प्रगतिशील शिक्षा (Progressive Education) के सिद्धांतों पर आधारित था। उनका मानना
था कि शिक्षा केवल किसी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने या जीवन के लिए तैयार
होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए,
बल्कि यह जीवन का स्वयं एक महत्वपूर्ण
हिस्सा है। उनके अनुसार शिक्षा का वास्तविक मूल्य केवल पुस्तकीय ज्ञान या तकनीकी
दक्षता में नहीं,
बल्कि विद्यार्थियों के संपूर्ण विकास
और समाज में सक्रिय योगदान देने की क्षमता में निहित है। डेवी ने शिक्षा को अनुभव
और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया के रूप में देखा, जिसमें बालक अपने परिवेश से निरंतर
सीखता है और उस सीखने की प्रक्रिया में अपने निर्णय और विचार विकसित करता है।
शिक्षा
जीवन की तैयारी नहीं,
बल्कि
जीवन स्वयं है - डेवी का यह विचार शिक्षा के दृष्टिकोण
में क्रांतिकारी था। उनका मानना था कि शिक्षा केवल भविष्य के लिए तैयार करने का
साधन नहीं है। वे इसे जीवन का अनुभव मानते थे। बालक जो कुछ भी सीखता है, वह केवल परीक्षा या भविष्य की नौकरी के
लिए नहीं, बल्कि उसका हर अनुभव उसके जीवन को
समृद्ध और अर्थपूर्ण बनाता है। शिक्षा की वास्तविक सफलता तब होती है जब बालक अपने
अनुभवों के माध्यम से सोचने,
समझने और निर्णय लेने की क्षमता विकसित
करता है। इसका अर्थ यह है कि स्कूल केवल ज्ञान देने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन के विविध अनुभवों का
प्रशिक्षण स्थल है।
ज्ञान
स्थिर नहीं,
बल्कि
अनुभव से विकसित होता है
– डेवी
के अनुसार ज्ञान कोई स्थायी या अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं है। यह लगातार बदलता और
विकसित होता है। ज्ञान को केवल किताबों या शिक्षकों से ग्रहण करना पर्याप्त नहीं
है; इसे बालक अपने अनुभव, प्रयोग और सामाजिक सहभागिता से उत्पन्न
करता है। उदाहरणस्वरूप,
एक वैज्ञानिक प्रयोग या सामाजिक समस्या
का हल खोजने का प्रयास बालक को केवल तथ्य नहीं, बल्कि
तर्क और विश्लेषण की कला भी सिखाता है। इस प्रकार, शिक्षा
का मूल उद्देश्य बालक को ज्ञान का सक्रिय निर्माता बनाना है, न कि केवल उसका उपभोक्ता।
सीखना
करके सीखना (Learning
by Doing) – डेवी के शिक्षण दर्शन का एक महत्वपूर्ण
सिद्धांत था ‘सीखना करके सीखना’। उनका मानना था कि बच्चों को केवल
सुनकर या पढ़कर नहीं,
बल्कि वास्तविक अनुभव और गतिविधियों के
माध्यम से सीखना चाहिए। उदाहरण के लिए, गणित
के सूत्र केवल याद करने के बजाय रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं में उनका प्रयोग
करना अधिक प्रभावशाली होता है। इसी प्रकार, इतिहास
केवल घटनाओं का संग्रह नहीं,
बल्कि उन घटनाओं के कारण और परिणामों का
विश्लेषण करना सीखना है।
शिक्षा
का उद्देश्य लोकतांत्रिक नागरिक तैयार करना – डेवी
का मानना था कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि समाज में जिम्मेदार और सक्रिय
नागरिक तैयार करना है। लोकतांत्रिक समाज में बालकों को स्वतंत्रता, सहिष्णुता, न्याय और समानता के मूल्यों का अनुभव और
ज्ञान होना चाहिए। पाठ्यक्रम और शिक्षण प्रक्रिया में समूह कार्य, सामाजिक परियोजनाएँ और सामूहिक निर्णय
लेने की गतिविधियाँ शामिल करके बालक में लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ विकसित की जा
सकती है। इस प्रकार शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र की नींव बनाने
का साधन बनती है।
विषय
साधन हैं,
उद्देश्य
नहीं – डेवी के अनुसार शिक्षा में विषय (Subjects) केवल साधन हैं, उद्देश्य नहीं। बालक के वास्तविक अनुभव, सामाजिक समस्या समाधान और रचनात्मक
गतिविधियाँ शिक्षा का मूल उद्देश्य हैं। विषयगत ज्ञान का प्रयोग बालक को सोचने, विश्लेषण करने और नए समाधान खोजने की
क्षमता विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा केवल
विषयों के अनुशासनात्मक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे जीवन के अनुभव और सामाजिक
संदर्भ से जोड़कर लागू किया जाना चाहिए।
पाठ्यक्रम
में अनुभव और समस्या-समाधान का समावेश – डेवी
के अनुसार पाठ्यक्रम केवल पुस्तकों और अध्यापकों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे
बालक के अनुभवों,
सामाजिक परिस्थितियों और समस्या-समाधान
की प्रक्रियाओं से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। उदाहरणस्वरूप, यदि बच्चे पानी की कमी या पर्यावरण
संरक्षण जैसी समस्याओं पर कार्य करें, तो
वे केवल तथ्यों को नहीं सीखते,
बल्कि समस्या पहचानने, समाधान सुझाने और समाज के लिए उपयोगी
कार्य करने की क्षमता भी विकसित करते हैं। इस दृष्टिकोण से पाठ्यक्रम जीवंत, सजीव और बालक-केंद्रित बन जाता है।
3. विद्यालयी पाठ्यक्रम की समग्र संरचना: डेवी का दृष्टिकोण
(The Comprehensive Structure of
School Curriculum: Dewey’s Perspective)
जॉन डेवी का पाठ्यक्रम दर्शन पारंपरिक दृष्टिकोण से पूरी तरह
अलग था। उन्होंने पाठ्यक्रम को केवल अलग-अलग विषयों का यांत्रिक या औपचारिक संयोजन
नहीं माना। उनके अनुसार,
पाठ्यक्रम को एक समग्र, समन्वित और जीवंत संरचना के रूप में
देखा जाना चाहिए,
जिसमें बालक के अनुभव, सामाजिक वास्तविकताएँ और जीवन की
समस्याएँ केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। डेवी ने यह जोर देकर कहा कि शिक्षा केवल
ज्ञान के टुकड़ों का संचय नहीं,
बल्कि सोचने, समझने और समाज में सक्रिय योगदान देने
की प्रक्रिया है।
विषय
आपस में जुड़े होने चाहिए - डेवी के अनुसार पाठ्यक्रम में शामिल सभी
विषय आपस में स्वतंत्र और अलग-थलग नहीं होने चाहिए। प्रत्येक विषय अन्य विषयों के
साथ संबंध स्थापित करता है और एक समग्र अनुभव प्रदान करता है। उदाहरण स्वरूप, विज्ञान, गणित
और सामाजिक अध्ययन केवल अलग-अलग पाठ्यक्रम के रूप में नहीं पढ़ाए जाने चाहिए, बल्कि इन्हें वास्तविक जीवन की समस्याओं
और परियोजनाओं के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए। इससे बालक को यह समझने
में मदद मिलती है कि ज्ञान का प्रयोग केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी किया जा
सकता है।
पाठ्यक्रम
जीवन की समस्याओं से निकला होना चाहिए - डेवी का मानना था कि पाठ्यक्रम केवल
किताबों और सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे जीवन की वास्तविक
समस्याओं और परिस्थितियों से उत्पन्न होना चाहिए। जब बालक अपने आसपास की समस्याओं
जैसे पर्यावरण संरक्षण,
सामाजिक समानता या स्थानीय समुदाय की
चुनौतियों पर काम करता है,
तो वह न केवल तथ्य और तकनीकी ज्ञान
सीखता है, बल्कि समस्या समाधान, निर्णय लेने और सामाजिक जिम्मेदारी जैसी
महत्वपूर्ण क्षमताओं का विकास भी करता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम जीवन का प्रतिबिंब
बन जाता है और शिक्षा बालक के अनुभवों के साथ जीवंत रूप में जुड़ती है।
विषयों
का मूल्य उनके प्रयोग और सामाजिक उपयोगिता से तय होता है
- डेवी
के दृष्टिकोण में किसी विषय का मूल्य केवल उसकी विषय-सूची या अकादमिक जटिलता से तय
नहीं होता। बल्कि इसका मूल्य इस बात से निर्धारित होता है कि बालक उस ज्ञान का
प्रयोग अपने जीवन और समाज में कैसे कर सकता है। उदाहरण के लिए, गणित के सूत्र केवल याद करने के बजाय
उनके व्यावहारिक उपयोग जैसे बजट तैयार करना, डेटा
विश्लेषण या परियोजना योजना में लगाना अधिक महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार, भाषा और सामाजिक अध्ययन का महत्व तब
होता है जब बालक उन्हें संवाद,
सोच और सामाजिक सहभागिता में लागू कर
सके।
विभिन्न
अनुशासनात्मक क्षेत्रों की भूमिका - डेवी के दृष्टिकोण में विभिन्न
अनुशासनात्मक क्षेत्र जैसे विज्ञान, गणित, भाषा, कला, और सामाजिक अध्ययन केवल विषय नहीं, बल्कि बालक के समग्र विकास के साधन हैं।
प्रत्येक अनुशासन बालक के सोचने,
विश्लेषण करने और रचनात्मक रूप से
समस्या हल करने की क्षमता को विकसित करता है। उदाहरण स्वरूप, विज्ञान बालक को तर्क और परीक्षण की
क्षमता सिखाता है,
गणित विश्लेषणात्मक सोच में सहायक होता
है, जबकि सामाजिक अध्ययन उसे सामाजिक और
नैतिक जिम्मेदारियों से अवगत कराता है। इस समग्र दृष्टिकोण से पाठ्यक्रम केवल
ज्ञान का संग्रह नहीं,
बल्कि जीवन और समाज की विविध चुनौतियों
से निपटने की क्षमता का विकास करने वाला माध्यम बन जाता है।
डेवी का पाठ्यक्रम दर्शन यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा केवल
विषयों के यांत्रिक संयोजन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसे बालक के अनुभव, सामाजिक आवश्यकताओं और जीवन की समस्याओं
से जोड़कर डिजाइन किया जाना चाहिए। ऐसे पाठ्यक्रम में ज्ञान, अनुभव और कौशल का संतुलन होता है, जो बालक को न केवल बौद्धिक रूप से
विकसित करता है, बल्कि उसे जिम्मेदार, रचनात्मक और सक्रिय नागरिक बनने में भी
सक्षम बनाता है।
4. भाषा की
भूमिका
(Role of Language):
(i) भाषा: संप्रेषण और सामाजिक सहभागिता का माध्यम –
जॉन डेवी के अनुसार भाषा केवल शब्दों या वाक्यों का संग्रह
नहीं है, बल्कि यह सोचने, समझने और सामाजिक रूप से जुड़ने का
प्रमुख माध्यम है। उनके दृष्टिकोण में भाषा बच्चों के बौद्धिक और सामाजिक विकास का
मूल आधार है। भाषा के माध्यम से बालक अपने अनुभवों, भावनाओं
और विचारों को व्यक्त करता है। यह केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, बल्कि समाज में संवाद, सहयोग और सामूहिक निर्णय लेने की
प्रक्रिया में भी अहम भूमिका निभाती है।
अपने
अनुभव साझा करना - डेवी के अनुसार बालक भाषा के माध्यम से
अपने व्यक्तिगत अनुभवों और ज्ञान को दूसरों के साथ साझा करता है। उदाहरण स्वरूप, जब बच्चे अपनी दिनचर्या, खेलकूद की गतिविधियों या किसी परियोजना
के परिणाम के बारे में चर्चा करते हैं, तो
वे केवल जानकारी साझा नहीं कर रहे होते, बल्कि
अपने अनुभवों को व्यवस्थित और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना सीखते हैं। इस
प्रक्रिया से बालक में आत्म-विश्लेषण और अनुभवों का मूल्यांकन करने की क्षमता
विकसित होती है।
सामाजिक
संवाद करना - भाषा सामाजिक सहभागिता का मुख्य आधार
है। डेवी मानते थे कि बालक केवल व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि समूह और समुदाय के संदर्भ में भी
सीखते हैं। समूह में बातचीत,
बहस और सहयोग के माध्यम से बालक न केवल
ज्ञान अर्जित करता है,
बल्कि सहिष्णुता, सहकारिता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गुण
भी विकसित करता है। संवाद के बिना बालक समाज में अपने विचारों और भावनाओं को
प्रभावी रूप से साझा नहीं कर सकता, और
न ही किसी समस्या का सामूहिक समाधान खोज सकता है।
विचारों
को स्पष्ट रूप देना - भाषा बालक को अपने विचारों को तार्किक
और स्पष्ट रूप में व्यक्त करने में मदद करती है। डेवी के अनुसार, जब बालक किसी परियोजना के निष्कर्ष, कहानी, नाटक
या बहस के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करता है, तो
वह केवल दूसरों को समझाने का प्रयास नहीं करता, बल्कि
स्वयं अपने विचारों और तर्क को भी व्यवस्थित करता है। इस प्रकार भाषा बालक में
सोचने, विश्लेषण करने और रचनात्मक समाधान खोजने
की क्षमता विकसित करती है।
भाषा
और लोकतांत्रिक समाज - डेवी का मानना था कि भाषा लोकतांत्रिक
समाज की आत्मा है। लोकतंत्र में संवाद, बहस
और सहयोग अनिवार्य हैं,
और ये सभी प्रक्रियाएँ भाषा के माध्यम
से ही संभव होती हैं। यदि बालक संवाद और भाषाई अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचार
साझा करना सीखते हैं,
तो वे केवल अच्छे वक्ता नहीं बनते, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे समानता, सहिष्णुता और सामाजिक सहभागिता को भी
समझते हैं। इस प्रकार भाषा न केवल बौद्धिक विकास का साधन है, बल्कि बालक में लोकतांत्रिक चेतना और
सामाजिक उत्तरदायित्व भी विकसित करती है।
(ii) पाठ्यक्रम में भाषा का स्थान –
डेवी के अनुसार भाषा को पाठ्यक्रम में केवल एक विषय के रूप में
नहीं, बल्कि सभी गतिविधियों और अनुभवों में एक समन्वित माध्यम के रूप
में शामिल किया जाना चाहिए। भाषा को बालक के जीवन,
अनुभव और सामाजिक संदर्भ से जोड़कर
सिखाना चाहिए।
जीवन
से जुड़े अनुभव - भाषा का शिक्षण केवल किताबों या व्याकरण
तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे बच्चों के दैनिक जीवन, अनुभव और सामाजिक परिदृश्य से जोड़ना
आवश्यक है। उदाहरण के लिए,
बच्चों को अपने आस-पास की घटनाओं, पर्यावरणीय समस्याओं या व्यक्तिगत
अनुभवों पर लिखने और बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इस प्रकार बालक न केवल
शब्दावली और व्याकरण सीखते हैं,
बल्कि जीवन से जुड़े अर्थपूर्ण संवाद और
विचारशीलता भी विकसित करते हैं।
चर्चा, वाद-विवाद, कहानी और नाटक
- भाषा
का विकास केवल लिखित अभ्यास से नहीं, बल्कि
बहस, चर्चा, कहानी
सुनाना और नाटक जैसी रचनात्मक गतिविधियों से भी होता है। बालक जब समूह में अपनी
राय प्रस्तुत करता है,
किसी कहानी का मंचन करता है या सामाजिक
मुद्दों पर बहस करता है,
तो वह भाषा के माध्यम से सोचने, तर्क करने और दूसरों के दृष्टिकोण को
समझने की कला सीखता है। इससे बालक में आत्मविश्वास, रचनात्मकता
और संवाद कौशल का विकास होता है।
समूह कार्य और परियोजनाएँ - डेवी पाठ्यक्रम में भाषा को समूह कार्य और परियोजनाओं के माध्यम से सिखाने पर जोर देते थे। जब बालक किसी परियोजना पर काम करता है और अपनी टीम के साथ संवाद करता है, तो वह भाषा का प्रयोग केवल संप्रेषण के लिए नहीं करता, बल्कि समस्या समाधान, योजना निर्माण और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी शामिल होता है। यह दृष्टिकोण भाषा को सक्रिय और व्यावहारिक बनाने में मदद करता है।
भाषा
का उद्देश्य - डेवी के अनुसार भाषा का उद्देश्य केवल
व्याकरण, शब्दावली या लिखित तकनीक तक सीमित नहीं
होना चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य बालक में सार्थक संप्रेषण, विचारशीलता और चिंतन का विकास करना है।
भाषा के माध्यम से बालक न केवल संवाद और अभिव्यक्ति कौशल सीखते हैं, बल्कि अपने अनुभवों को समझने, उनका विश्लेषण करने और समाज में
जिम्मेदार नागरिक बनने की क्षमता भी विकसित करते हैं।
5. गणित की भूमिका (Role of Mathematics):
(i) गणित: तार्किक चिंतन का विकास -
जॉन डेवी के दृष्टिकोण में गणित केवल संख्याओं, सूत्रों और अमूर्त अवधारणाओं का संग्रह
नहीं है। वे इसे बालक के बौद्धिक विकास और तार्किक सोच को मजबूत करने वाला एक
शक्तिशाली माध्यम मानते थे। उनके अनुसार गणित शिक्षा बालक में केवल अंकगणितीय या
सांख्यिकीय क्षमता नहीं,
बल्कि तर्कशीलता, समस्या-समाधान और निर्णय-क्षमता जैसे
महत्वपूर्ण गुणों का विकास करता है। डेवी का विचार था कि गणित का असली
उद्देश्य बालक को सोचने और समझने की क्षमता प्रदान करना है। उदाहरणस्वरूप, जब बालक किसी व्यावहारिक समस्या का
समाधान गणितीय दृष्टिकोण से करता है—जैसे
किसी वस्तु की मात्रा या दूरी का निर्धारण—तो
वह केवल अंकगणित नहीं सीखता,
बल्कि तार्किक ढंग से समस्याओं को
पहचानने और उनका विश्लेषण करने की क्षमता भी विकसित करता है। इस प्रकार गणित न
केवल शैक्षणिक विषय है,
बल्कि दैनिक जीवन में निर्णय लेने और
तर्कशील दृष्टिकोण अपनाने का आधार भी बनता है।
(ii) अनुभव-आधारित गणित -
डेवी का मानना था कि गणित केवल किताबों और सैद्धांतिक सूत्रों
तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और अनुभवों के
माध्यम से सिखाया जाना चाहिए। जब बालक मापन, लेन-देन, समय, दूरी, योजना और संगठन जैसी दैनिक जीवन
स्थितियों से गणित सीखता है,
तो वह इसे न केवल समझता है, बल्कि इसका व्यावहारिक उपयोग भी कर पाता
है।
मापन
- मापन
गतिविधियाँ जैसे किसी वस्तु की लंबाई, वजन
या आयतन नापना बालक को गणितीय अवधारणाओं से परिचित कराती हैं। यह केवल अंकगणित
नहीं, बल्कि वास्तविक दुनिया में संख्याओं के
प्रयोग और अनुपात की समझ विकसित करता है।
लेन-देन
- बाजार
में लेन-देन, खरीद-फरोख्त या बजट बनाना बालक को धन, मूल्य और गणितीय कार्यों का व्यावहारिक
अनुभव प्रदान करता है। इससे वह अंकगणितीय क्रियाओं को केवल रट्टे से सीखने के बजाय
वास्तविक जीवन की समस्याओं में लागू करना सीखता है।
समय
और दूरी - समय का निर्धारण, यात्रा
की दूरी की गणना और योजनाएँ बनाना बालक को गणितीय सोच के साथ-साथ तार्किक और
रणनीतिक योजना बनाने की क्षमता भी सिखाता है।
योजना
और संगठन - किसी परियोजना या खेल गतिविधि की योजना
बनाना, संसाधनों का प्रबंधन करना और कार्यों का
क्रम निर्धारित करना बालक में संगठन और गणितीय तर्क विकसित करता है।
डेवी के अनुसार, जब
गणित को जीवन के संदर्भ से जोड़ा जाता है, तो
यह बोझ नहीं, बल्कि उपयोगी बौद्धिक उपकरण बन जाता है।
गणित केवल परीक्षा के लिए नहीं,
बल्कि समस्या समाधान, योजना निर्माण और तार्किक सोच के विकास
के लिए सीखना चाहिए। इस दृष्टिकोण से गणित शिक्षा न केवल बच्चों के बौद्धिक विकास
में योगदान देती है,
बल्कि उन्हें जीवन में निर्णय लेने, समस्याओं का विश्लेषण करने और समाज में
सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम बनाती है।
6.
सामाजिक विज्ञान की भूमिका
(Role of Social Science):
(i)
सामाजिक विज्ञान: समाज की समझ -
जॉन डेवी के अनुसार शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान का संचय
नहीं, बल्कि बालक को समाज से जोड़ना और उसे
सामाजिक संदर्भ में सक्रिय बनाना है। इस दृष्टिकोण में सामाजिक विज्ञान बच्चों को
अपने आसपास की दुनिया को समझने और विश्लेषण करने का अवसर प्रदान करता है। सामाजिक
विज्ञान केवल तथ्यों और सूचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि
यह समाज की संरचना,
प्रक्रियाओं और मूल्यों को
समझने का माध्यम है। सामाजिक विज्ञान के प्रमुख क्षेत्र जैसे
इतिहास, भूगोल, राजनीति
और अर्थशास्त्र बालक को न केवल जानकारी प्रदान करते हैं, बल्कि उनके सोचने और निर्णय लेने की
क्षमता को भी विकसित करते हैं। उदाहरण के लिए, इतिहास
के अध्ययन से बालक सीखते हैं कि समाज कैसे विकसित हुआ, विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का
महत्व क्या है और ऐतिहासिक घटनाओं के सामाजिक और नैतिक परिणाम क्या हुए। भूगोल के
माध्यम से वे प्राकृतिक संसाधनों,
पर्यावरणीय प्रक्रियाओं और मानव-प्रकृति
संबंधों को समझते हैं। राजनीति और अर्थशास्त्र बालक को यह सिखाते हैं कि समाज किस
प्रकार संगठित होता है,
नीति और निर्णय कैसे बनते हैं, और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण क्यों
महत्वपूर्ण है। इस प्रकार सामाजिक विज्ञान बालक को सामाजिक वास्तविकताओं के प्रति
संवेदनशील और जागरूक बनाता है।
(ii)
लोकतांत्रिक नागरिकता का विकास -
डेवी का दृष्टिकोण था कि सामाजिक विज्ञान केवल ज्ञान का साधन
नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की प्रयोगशाला
है। इसके माध्यम से बालक समाज में सक्रिय भागीदारी, सहकारिता
और नैतिक जिम्मेदारी के महत्व को अनुभव करता है। जब बालक किसी सामाजिक समस्या पर
चर्चा करता है, समूह परियोजना में काम करता है या
सामाजिक मुद्दों का विश्लेषण करता है, तो
वह न केवल तथ्यों को सीखता है,
बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे सहयोग, सहिष्णुता, अधिकार और कर्तव्य तथा सामाजिक
उत्तरदायित्व को भी आत्मसात करता है। सामाजिक विज्ञान बालक को यह समझने में
मदद करता है कि समाज केवल व्यक्तिगत हितों का समूह नहीं है, बल्कि सहयोग, संवाद और सहिष्णुता पर आधारित एक साझा
संरचना है। इसके माध्यम से बालक में यह क्षमता विकसित होती है कि वह समाज में
न्यायपूर्ण और जिम्मेदार निर्णय ले सके। इसके अलावा, सामाजिक
विज्ञान बच्चों में सामाजिक चेतना और नैतिक समझ को भी विकसित करता है, जिससे वे न केवल अपने अधिकारों को समझते
हैं, बल्कि अपने कर्तव्यों और समाज के प्रति
जिम्मेदारियों को भी पहचानते हैं।
इस प्रकार,
सामाजिक विज्ञान केवल जानकारी का साधन
नहीं है; यह बालक में सामाजिक समझ, नैतिक मूल्य और लोकतांत्रिक नागरिकता की
भावना विकसित करने वाला महत्वपूर्ण उपकरण है। डेवी के दृष्टिकोण में यह विषय बालक
को समाज में सक्रिय,
जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाने का
माध्यम बनता है।
7. विज्ञान की भूमिका (Role of Science):
(i) विज्ञान: वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास -
जॉन डेवी के अनुसार विज्ञान केवल तथ्यों और सूचनाओं का संग्रह
नहीं है। उनके दृष्टिकोण में विज्ञान एक सक्रिय और अनुभवात्मक प्रक्रिया है, जो बालक में जिज्ञासा, प्रयोग, परीक्षण
और निष्कर्ष निकालने की क्षमता विकसित करती है। डेवी का मानना था कि विज्ञान शिक्षा
का उद्देश्य बालक को केवल ज्ञान देना नहीं है, बल्कि
उसे सोचने, प्रश्न पूछने और तार्किक रूप से
समस्याओं का समाधान करने की वैज्ञानिक पद्धति सिखाना है।
जब बालक किसी प्राकृतिक घटना या समस्या
का निरीक्षण करता है,
प्रयोग करता है और परिणामों का विश्लेषण
करता है, तो वह केवल तथ्य नहीं सीखता, बल्कि तर्क, विश्लेषण और निष्कर्ष निकालने की क्षमता
भी विकसित करता है। उदाहरण के लिए, पानी
का वाष्पीकरण या पौधों की वृद्धि का अध्ययन केवल याद करने के लिए नहीं, बल्कि इन्हें प्रयोग और निरीक्षण के
माध्यम से समझने के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार, विज्ञान
शिक्षा बालक में आलोचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का माध्यम
बनती है।
(ii) जीवन से जुड़ा विज्ञान -
डेवी विज्ञान शिक्षा को केवल प्रयोगशाला या कक्षा तक सीमित
नहीं मानते थे। उनका दृष्टिकोण यह था कि विज्ञान को वास्तविक जीवन और अनुभवों से
जोड़कर सिखाना चाहिए। इससे बालक न केवल अवधारणाओं को समझता है, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन में लागू
करना भी सीखता है।
स्वास्थ्य
- विज्ञान
शिक्षा बच्चों को स्वास्थ्य और पोषण, व्यक्तिगत
स्वच्छता और रोग-प्रतिरोधकता के महत्व के बारे में जागरूक करती है। उदाहरण के लिए, बच्चों को हाथ धोने, सफाई और संतुलित आहार की वैज्ञानिक
वजहें समझाना, उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति
जिम्मेदार बनाता है।
पर्यावरण
- बालक
प्राकृतिक संसाधनों,
जलवायु और पर्यावरणीय संतुलन के महत्व
को विज्ञान के माध्यम से समझते हैं। वे यह सीखते हैं कि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों
के संरक्षण में वैज्ञानिक ज्ञान कैसे मदद कर सकता है।
तकनीक
- डेवी
के अनुसार विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि
तकनीकी विकास और दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने का उपकरण भी है। बच्चों को
तकनीकी उपकरणों, ऊर्जा स्रोतों और विज्ञान के व्यावहारिक
प्रयोगों के माध्यम से समस्याओं का समाधान करना सिखाया जाना चाहिए।
दैनिक
समस्याएँ - विज्ञान को बच्चों के रोजमर्रा के जीवन
से जोड़ना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, समय, तापमान, मौसम, ऊर्जा, पौधों
और जानवरों की जीवन प्रक्रियाओं को समझना बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और
व्यावहारिक बुद्धि को विकसित करता है।
इस प्रकार,
विज्ञान शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान
नहीं, बल्कि बालक में जिज्ञासा, तर्कशीलता, प्रयोगात्मक कौशल और व्यावहारिक बुद्धि विकसित करने का माध्यम बनती है। डेवी के
दृष्टिकोण में विज्ञान बालक को न केवल बुद्धिमान बनाता है, बल्कि समाज और जीवन में समस्याओं का
तर्कसंगत और वैज्ञानिक समाधान ढूंढने में भी सक्षम बनाता है।
8. अनुशासनात्मक क्षेत्रों का समन्वय: डेवी
की दृष्टि (Coordination
of Disciplinary Areas: Dewey’s Perspective):
जॉन डेवी का शैक्षणिक दर्शन पारंपरिक
पाठ्यक्रम संरचनाओं से अलग था। वे विषयों के अलग-अलग और पृथक अध्यापन के कट्टर
विरोधी थे। उनके अनुसार, शिक्षा केवल अलग-अलग विषयों के ज्ञान का
संचय नहीं है, बल्कि यह एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाकर बालक में सोच, समझ और सामाजिक व्यवहार विकसित करने का
माध्यम है। डेवी मानते थे कि विषयों को अलग-अलग
अध्यापन के बजाय संपूर्ण अनुभव और जीवन की समस्याओं के संदर्भ में जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण
के लिए, जब बालक किसी पर्यावरणीय परियोजना पर
काम करता है, तो वह केवल विज्ञान सीखता है नहीं, बल्कि गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान का भी प्रयोग
करता है। इसे डेवी ने अंतःविषयक (Interdisciplinary) दृष्टिकोण कहा, जिसमें
बालक विभिन्न अनुशासनात्मक क्षेत्रों को आपस में जोड़कर सीखता है।
भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का समन्वय
- डेवी
के दृष्टिकोण में भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान केवल स्वतंत्र विषय नहीं हैं। ये
सभी अनुशासन बालक के संज्ञानात्मक और सामाजिक विकास में एक-दूसरे का पूरक हैं।
उदाहरणस्वरूप:
·
भाषा बालक को विचार व्यक्त करने और संवाद करने में सक्षम बनाती
है।
·
गणित तार्किक सोच और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करता है।
·
विज्ञान जिज्ञासा, प्रयोग
और निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया सिखाता है।
·
सामाजिक विज्ञान समाज, संस्कृति
और नैतिक मूल्यों की समझ प्रदान करता है।
जब ये विषय जीवन की वास्तविक समस्याओं के
इर्द-गिर्द एकीकृत रूप में पढ़ाए जाते हैं, तो बालक न केवल तथ्यों और सूचनाओं को सीखता है, बल्कि उनका प्रयोग, विश्लेषण और मूल्यांकन करना भी सीखता
है। इस तरह का पाठ्यक्रम बालक में समग्र सोच, तार्किक विश्लेषण और सामाजिक चेतना विकसित करता है।
अंतःविषयक दृष्टिकोण का महत्व –
अंतःविषयक दृष्टिकोण बालक को केवल
विषयगत ज्ञान तक सीमित नहीं करता। यह उसे जीवन की जटिलताओं को समझने, समस्याओं के बहुआयामी समाधान खोजने और
विभिन्न दृष्टिकोणों को एकीकृत रूप में देखने की क्षमता प्रदान करता है। उदाहरण
स्वरूप, जल संरक्षण पर परियोजना में बालक
विज्ञान के प्रयोगों के माध्यम से जल स्रोतों का अध्ययन करता है, गणित के प्रयोग से जल की मात्रा का
निर्धारण करता है, भाषा के माध्यम से परिणाम साझा करता है
और सामाजिक विज्ञान के दृष्टिकोण से इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को समझता
है।
इस प्रकार, डेवी का अनुशासनात्मक समन्वय बालक को ज्ञान के विभिन्न आयामों को एकीकृत रूप में समझने और वास्तविक जीवन में लागू करने की क्षमता प्रदान करता है। यह दृष्टिकोण पारंपरिक पाठ्यक्रम संरचना से कहीं अधिक जीवंत, अनुभवात्मक और समाज-केंद्रित है।
9. जॉन डेवी के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance of John Dewey’s Ideas):
जॉन डेवी का शैक्षणिक दर्शन केवल उनके समय तक सीमित नहीं था, बल्कि आज के आधुनिक शिक्षा मॉडल में भी
उसकी गहरी प्रासंगिकता देखी जा सकती है। उनके अनुभवात्मक और प्रगतिशील दृष्टिकोण
ने आधुनिक शिक्षा प्रणालियों के मूल आधार को प्रभावित किया है। आज की शिक्षा में
अनुभवात्मक, कौशल-आधारित और लोकतांत्रिक तत्वों का
समावेश डेवी के विचारों की आधुनिक अभिव्यक्ति है।
अनुभवात्मक
शिक्षा (Experiential
Learning) - डेवी
का मानना था कि शिक्षा केवल किताबों और सिद्धांतों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
बच्चों को वास्तविक अनुभवों के माध्यम से सीखने का अवसर मिलना चाहिए। आज की शिक्षा
में यह दृष्टिकोण अनुभवात्मक शिक्षा (Experiential Learning) के रूप में देखा जा सकता है। उदाहरण
स्वरूप, विज्ञान के प्रयोग, सामाजिक परियोजनाएँ और कला-संस्कृति
गतिविधियाँ बालक को सीखने के लिए सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर प्रदान करती हैं।
यह दृष्टिकोण बालक में आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान
की क्षमता और रचनात्मकता को बढ़ावा देता है।
प्रोजेक्ट-आधारित
लर्निंग (Project-Based
Learning) - डेवी
प्रोजेक्ट-आधारित और गतिविधि-केन्द्रित शिक्षा के पक्षधर थे। आज के युग में
प्रोजेक्ट-आधारित लर्निंग के माध्यम से बच्चे वास्तविक जीवन की समस्याओं को समझते
हैं, उनका विश्लेषण करते हैं और समाधान खोजते
हैं। उदाहरण के लिए,
पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदाय के विकास, या विज्ञान और गणित परियोजनाओं के
माध्यम से बालक केवल ज्ञान अर्जित नहीं करते, बल्कि
उसे व्यावहारिक रूप में लागू करना भी सीखते हैं। यह डेवी के “Learning by Doing” के सिद्धांत की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति
है।
कौशल-आधारित पाठ्यक्रम (Skill-Based Curriculum) - आज के समय में शिक्षा केवल विषयगत ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों में जीवनोपयोगी कौशल विकसित करने पर केंद्रित है। डेवी के विचारों के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य बालक को सोचने, निर्णय लेने और समस्याओं को हल करने में सक्षम बनाना है। नई शिक्षा नीतियों (NEP) में कौशल-आधारित पाठ्यक्रम का समावेश, जैसे संवाद कौशल, विश्लेषणात्मक क्षमता, तकनीकी दक्षता और सहयोगात्मक कार्य, सीधे तौर पर डेवी के दृष्टिकोण से मेल खाते हैं।
लोकतांत्रिक
शिक्षा (Democratic
Education) - डेवी
का मानना था कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं, बल्कि बालक को समाज का जिम्मेदार और
सक्रिय नागरिक बनाने के लिए होनी चाहिए। लोकतांत्रिक शिक्षा बच्चों को संवाद, बहस, सहयोग
और सहिष्णुता का अनुभव कराती है। आज के समय में स्कूलों और पाठ्यक्रमों में समूह
कार्य, छात्र परिषद, बहस प्रतियोगिताएँ और सामुदायिक सेवा
जैसी गतिविधियाँ बच्चों को लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों से
परिचित कराती हैं। यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर डेवी के लोकतांत्रिक शिक्षा के
सिद्धांत की पुष्टि करता है।
10. चुनौतियाँ और सीमाएँ (Challenges and Limitations):
जॉन
डेवी का शैक्षणिक दर्शन अत्यंत उन्नत और प्रगतिशील था। उन्होंने शिक्षा को
बालक-केंद्रित, अनुभव-आधारित और लोकतांत्रिक बनाने पर
जोर दिया। हालांकि,
आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इस दर्शन को
पूर्ण रूप से लागू करना कई प्रकार की चुनौतियों और सीमाओं के कारण कठिन है। ये
बाधाएँ न केवल पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों से जुड़ी हैं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक संरचनाओं से
भी संबंधित हैं।
परीक्षा-केंद्रित
शिक्षा व्यवस्था - अधिकांश स्कूल और शिक्षा प्रणाली आज भी
परीक्षा-केंद्रित हैं,
जहां केवल अंक और परिणाम पर ध्यान दिया
जाता है। डेवी के दृष्टिकोण में शिक्षा का उद्देश्य बालक का समग्र विकास और
अनुभवात्मक सीखना है,
न कि केवल परीक्षा में अच्छे अंक
प्राप्त करना। परीक्षा-केंद्रित शिक्षा बालक की रचनात्मकता, समस्या-समाधान क्षमता और आलोचनात्मक सोच
को सीमित कर देती है। यह अनुभवात्मक और प्रोजेक्ट-आधारित शिक्षण के लिए एक बड़ी
बाधा बन जाती है।
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विषयों
का यांत्रिक विभाजन
- आज की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में
विषयों को अक्सर अलग-अलग और स्वतंत्र रूप से पढ़ाया जाता है। गणित, विज्ञान, भाषा
और सामाजिक विज्ञान को एक-दूसरे से अलग रखकर पढ़ाना डेवी के अंतःविषयक (Interdisciplinary) दृष्टिकोण
के विपरीत है। ऐसे यांत्रिक विभाजन से बालक में ज्ञान का समग्र और व्यावहारिक
उपयोग विकसित नहीं होता, और वह विषयों को केवल सैद्धांतिक और याद करने योग्य तथ्य के
रूप में सीखता है।
प्रशिक्षित
शिक्षकों की कमी - डेवी के अनुभवात्मक और बालक-केंद्रित
शिक्षा के मॉडल को लागू करने के लिए शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण आवश्यक है।
शिक्षकों को केवल विषय ज्ञान नहीं, बल्कि
बालक-केंद्रित शिक्षण,
प्रोजेक्ट-आधारित गतिविधियाँ संचालित
करने और लोकतांत्रिक कक्षा प्रबंधन में दक्ष होना चाहिए। अधिकांश स्थानों पर
प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी इस दर्शन को पूर्ण रूप से लागू करने में बड़ी बाधा
बनती है।
समय
और संसाधनों का अभाव - डेवी का अनुभवात्मक और प्रोजेक्ट-आधारित
शिक्षण मॉडल समय और संसाधनों की मांग करता है। वास्तविक परियोजनाएँ, प्रयोगात्मक गतिविधियाँ, समूह कार्य और सामुदायिक अध्ययन के लिए
पर्याप्त समय, सामग्री और सहायक संसाधनों की आवश्यकता
होती है। हालांकि,
आज की शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम की
घनीभूत संरचना, सीमित कक्षा समय और संसाधनों की कमी इस
दृष्टिकोण को लागू करने में गंभीर बाधा उत्पन्न करती है।
11.
निष्कर्ष (Conclusion):
जॉन डेवी के दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार विद्यालयी पाठ्यक्रम
में भाषा, गणित, सामाजिक
विज्ञान और विज्ञान को केवल अलग-अलग, सीमाबद्ध
और पुस्तकीय विषयों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें जीवन को समझने, अनुभव करने और सार्थक रूप से जीने के
प्रभावी साधन
के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। डेवी
का मानना था कि ज्ञान तभी अर्थपूर्ण बनता है, जब
वह बालक के दैनिक अनुभवों,
सामाजिक परिस्थितियों और वास्तविक
समस्याओं से जुड़ा हो। इस दृष्टि से भाषा संवाद, विचार-विमर्श
और सामाजिक सहभागिता का माध्यम बनती है; गणित
तार्किक सोच, समस्या-समाधान और निर्णय क्षमता को
विकसित करता है; सामाजिक विज्ञान बालक को समाज की संरचना, मूल्यों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से
परिचित कराता है;
तथा विज्ञान जिज्ञासा, प्रयोगशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को
सुदृढ़ करता है। इस प्रकार ये सभी अनुशासनात्मक क्षेत्र मिलकर बालक के बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक और व्यावहारिक विकास को समग्र रूप से आगे बढ़ाते हैं।