प्रस्तावना
भाषा मानव जीवन का आधार है क्योंकि यह विचारों, भावनाओं
और सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम है। हिंदी भारत की प्रमुख और व्यापक
रूप से बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है,
जो राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान
का भी प्रतीक है। हिंदी भाषा शिक्षण का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को पढ़ना और
लिखना सिखाना नहीं है, बल्कि उनमें भाषायी कौशलों का समग्र विकास करना भी है। हिंदी शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में सुनने, बोलने, पढ़ने
और लिखने की क्षमता विकसित की जाती है। इसके साथ ही उनमें अभिव्यक्ति क्षमता, विचार
शक्ति, तर्कशीलता, कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता का भी विकास
होता है। भाषा सीखना केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि
यह मानसिक विकास और सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करता है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भाषा शिक्षण
को केवल सूचना देने की प्रक्रिया नहीं माना जाता,
बल्कि इसे व्यक्तित्व विकास और संप्रेषण
क्षमता के विकास का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। आज के वैश्विक युग में प्रभावी
संप्रेषण कौशल अत्यंत आवश्यक है, और हिंदी शिक्षण इस आवश्यकता को पूरा
करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न शिक्षण विधियों और
सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है,
जो शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, रोचक, छात्र-केंद्रित
और उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। ये विधियाँ और सिद्धांत शिक्षकों को यह समझने में
सहायता करते हैं कि किस प्रकार विद्यार्थियों को भाषा का व्यावहारिक ज्ञान दिया
जाए ताकि वे वास्तविक जीवन में उसका प्रभावी उपयोग कर सकें।
इसके अतिरिक्त,
ये शिक्षण विधियाँ विद्यार्थियों में
आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने, समझने
और अभिव्यक्त करने की क्षमता प्रदान करती हैं। इस प्रकार हिंदी भाषा शिक्षण न केवल
शैक्षिक उपलब्धि का माध्यम है, बल्कि यह विद्यार्थियों के समग्र विकास
का एक सशक्त साधन भी है।
हिंदी भाषा शिक्षण विधियाँ
हिंदी शिक्षण में विभिन्न विधियाँ प्रयोग की जाती हैं, जिनका
चयन कक्षा स्तर, विषयवस्तु और शिक्षण उद्देश्य के अनुसार किया जाता है। इन
विधियों का मुख्य उद्देश्य भाषा सीखने की प्रक्रिया को सरल, प्रभावी
और रुचिकर बनाना है। भाषा शिक्षण की प्रत्येक विधि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं और
उनकी सीखने की क्षमता को ध्यान में रखकर विकसित की गई है, ताकि
वे भाषा को केवल समझें ही नहीं बल्कि उसका व्यावहारिक रूप से उपयोग भी कर सकें। हिंदी शिक्षण विधियाँ विद्यार्थियों में भाषायी कौशलों—सुनना, बोलना, पढ़ना
और लिखना—का संतुलित विकास करती हैं। साथ ही ये विधियाँ शिक्षण को अधिक
सक्रिय, सहभागी और अनुभवात्मक बनाती हैं। इससे विद्यार्थी केवल
निष्क्रिय श्रोता नहीं रहते, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय
भाग लेते हैं।
वर्तमान समय में शिक्षण को अधिक प्रभावी
बनाने के लिए पारंपरिक विधियों के साथ-साथ आधुनिक विधियों का भी प्रयोग किया जा
रहा है। इन विधियों के माध्यम से विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास, संप्रेषण
क्षमता और आलोचनात्मक सोच का विकास होता है।
इस प्रकार, हिंदी भाषा शिक्षण विधियाँ न केवल ज्ञान
प्रदान करने का माध्यम हैं, बल्कि वे भाषा सीखने की प्रक्रिया को रोचक, उद्देश्यपूर्ण
और जीवनोपयोगी बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
(1)
व्याकरण-अनुवाद विधि
इस विधि में भाषा के व्याकरणिक नियमों और अनुवाद पर विशेष
ध्यान दिया जाता है। विद्यार्थी मातृभाषा और हिंदी के बीच अनुवाद करके भाषा को
समझते हैं। इसमें शब्दार्थ, वाक्य संरचना और व्याकरण नियमों की गहन समझ विकसित की जाती है।
यह विधि मुख्य रूप से लिखित भाषा शिक्षण पर आधारित होती है, जिसमें
पाठ्यपुस्तकों, गद्यांशों और वाक्यों का अध्ययन अनुवाद के माध्यम से किया जाता
है। शिक्षक विद्यार्थियों को नियमों की व्याख्या करता है और विद्यार्थी उन्हें
अभ्यास के माध्यम से सीखते हैं।
इस विधि में भाषा को एक नियमबद्ध
प्रणाली के रूप में देखा जाता है, जहाँ शुद्धता और संरचना पर अधिक जोर
दिया जाता है। यह विधि विशेष रूप से प्रारंभिक स्तर पर भाषा की नींव मजबूत करने
में सहायक होती है।
लाभ:
- विद्यार्थियों में व्याकरण की
मजबूत समझ विकसित होती है।
- शब्द भंडार में वृद्धि होती है।
- लिखित भाषा पर पकड़ मजबूत होती है।
- अनुवाद कौशल विकसित होता है, जो
अन्य भाषाओं को समझने में सहायक होता है।
- परीक्षा की दृष्टि से यह विधि
उपयोगी सिद्ध होती है क्योंकि इसमें लिखित अभ्यास पर ध्यान दिया जाता है।
सीमाएँ:
- बोलने और सुनने के कौशल का
पर्याप्त विकास नहीं होता।
- भाषा का व्यावहारिक उपयोग सीमित
रहता है।
- यह विधि यांत्रिक और उबाऊ लग सकती
है, जिससे विद्यार्थियों की रुचि कम हो
सकती है।
- वास्तविक जीवन की संप्रेषणात्मक
स्थितियों का पर्याप्त अभ्यास नहीं होता।
- भाषा को केवल नियमों तक सीमित कर
देती है, जिससे रचनात्मकता प्रभावित हो सकती
है।
(2)
प्रत्यक्ष विधि
इस विधि में मातृभाषा का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि
शिक्षण केवल हिंदी भाषा में ही किया जाता है। शिक्षक चित्रों, वस्तुओं, संकेतों, हाव-भाव
और क्रियाओं के माध्यम से अर्थ स्पष्ट
करते हैं। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को सीधे लक्ष्य भाषा (हिंदी)
के संपर्क में लाना है, जिससे वे भाषा को प्राकृतिक रूप से सीख सकें। इसमें शब्दों और
वाक्यों का अर्थ समझाने के लिए वास्तविक जीवन की स्थितियों और दृश्य साधनों का
उपयोग किया जाता है। प्रत्यक्ष
विधि में विद्यार्थियों को भाषा का उपयोग करने के लिए अधिक अवसर दिए जाते हैं।
शिक्षक लगातार हिंदी में संवाद करता है और विद्यार्थी भी उसी भाषा में प्रतिक्रिया
देने का प्रयास करते हैं। इससे कक्षा का वातावरण पूरी तरह हिंदीमय हो जाता है, जो
भाषा अधिगम को अधिक प्रभावी बनाता है।
लाभ:
- भाषा का प्राकृतिक और व्यावहारिक
विकास होता है।
- सुनने और बोलने की क्षमता में
सुधार होता है।
- विद्यार्थी सोचने और समझने में
हिंदी का प्रयोग करते हैं।
- उच्चारण में
सुधार होता है।
- भाषा सीखने में रुचि और आत्मविश्वास
बढ़ता है।
- विद्यार्थी वास्तविक जीवन की
परिस्थितियों में भाषा का उपयोग करना सीखते हैं।
सीमाएँ:
- प्रारंभिक स्तर के विद्यार्थियों
के लिए यह विधि कठिन हो सकती है।
- सभी शब्दों और विचारों को केवल
संकेतों या चित्रों से समझाना संभव नहीं होता।
- व्याकरण की स्पष्ट और व्यवस्थित
समझ कम विकसित हो सकती है।
- अधिक समय और कुशल शिक्षक की
आवश्यकता होती है।
- कभी-कभी जटिल अवधारणाओं को समझने
में कठिनाई हो सकती है।
(3)
क्रियात्मक विधि
इस विधि में विद्यार्थी स्वयं क्रियाओं के
माध्यम से सीखते हैं। इसमें कहानी सुनाना,
नाटक,
संवाद,
खेल,
समूह कार्य, भूमिका-निर्वाह आदि गतिविधियाँ शामिल होती हैं। इस विधि का मुख्य उद्देश्य
विद्यार्थियों को सक्रिय रूप से सीखने की प्रक्रिया में शामिल करना है, जिससे
वे केवल सुनने या देखने तक सीमित न रहें बल्कि स्वयं करके सीखें। क्रियात्मक विधि में कक्षा का वातावरण जीवंत और रोचक बन जाता
है। विद्यार्थी अपनी रुचि और अनुभव के आधार पर भाषा का प्रयोग करते हैं। इससे भाषा
सीखना स्वाभाविक और आनंददायक बन जाता है। शिक्षक केवल मार्गदर्शक की भूमिका निभाता
है और विद्यार्थी स्वयं ज्ञान प्राप्त करते हैं।
लाभ:
- सीखना रोचक और सक्रिय होता है।
- विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ती
है।
- आत्म-अनुभव के माध्यम से सीखना
अधिक स्थायी होता है।
- संप्रेषण कौशल का विकास होता है।
- आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास
में वृद्धि होती है।
- सहयोग और समूह भावना का विकास होता
है।
- भाषा का व्यावहारिक उपयोग बेहतर
होता है।
सीमाएँ:
- सभी विषयवस्तु को इस विधि से
पढ़ाना संभव नहीं होता।
- अधिक समय और योजना की आवश्यकता
होती है।
- बड़े कक्षाओं में इसे नियंत्रित
करना कठिन हो सकता है।
- कभी-कभी अनुशासन बनाए रखना
चुनौतीपूर्ण होता है।
- सभी विद्यार्थियों की समान
भागीदारी सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
(4)
संरचनात्मक विधि
इस विधि में भाषा की संरचना पर
विशेष ध्यान दिया जाता है। विद्यार्थियों को वाक्य निर्माण के विभिन्न पैटर्न, नियम
और ढांचे सिखाए जाते हैं तथा उनका नियमित अभ्यास कराया जाता है। इसमें भाषा को
छोटे-छोटे संरचनात्मक भागों में विभाजित करके पढ़ाया जाता है, जैसे
शब्द क्रम, वाक्य रूपांतरण
और पैटर्न ड्रिल आदि।
इस विधि का मुख्य उद्देश्य
विद्यार्थियों को सही और शुद्ध वाक्य निर्माण में दक्ष बनाना है। शिक्षक विभिन्न
उदाहरणों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझाता है कि किस प्रकार शब्दों को
जोड़कर अर्थपूर्ण और व्याकरणिक रूप से सही वाक्य बनाए जाते हैं। अभ्यास के माध्यम
से विद्यार्थी भाषा की संरचना को धीरे-धीरे आत्मसात कर लेते हैं।
लाभ:
- सही वाक्य निर्माण की क्षमता
विकसित होती है।
- भाषा की संरचनात्मक समझ मजबूत होती
है।
- व्याकरणिक शुद्धता में सुधार होता है।
- भाषा के पैटर्न को समझने में
सहायता मिलती है।
- लेखन कौशल में सुधार होता है।
- विद्यार्थियों में भाषा के नियमों
के प्रति स्पष्टता आती है।
सीमाएँ:
- यह विधि कभी-कभी यांत्रिक लग सकती है।
- संप्रेषणात्मक कौशल पर कम ध्यान दिया जाता है।
- वास्तविक जीवन की भाषा उपयोग
स्थितियों का अभ्यास सीमित होता है।
- विद्यार्थियों की रचनात्मकता
प्रभावित हो सकती है।
- भाषा सीखना केवल नियमों तक सीमित
रह सकता है।
(5)
संप्रेषणात्मक विधि
इस विधि का उद्देश्य भाषा का वास्तविक जीवन में प्रभावी उपयोग
करना है। इसमें भाषा को केवल नियमों या पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर उसे
संप्रेषण का साधन माना जाता है। इस विधि में संवाद,
चर्चा,
समूह कार्य, भूमिका-निर्वाह, वाद-विवाद, साक्षात्कार
और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित गतिविधियाँ कराई जाती हैं। विद्यार्थी भाषा का
प्रयोग करके अर्थपूर्ण बातचीत करते हैं और वास्तविक जीवन जैसी स्थितियों में भाषा
का अभ्यास करते हैं। संप्रेषणात्मक
विधि में शिक्षक एक मार्गदर्शक
की भूमिका निभाता है, जबकि
विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाषा का उपयोग करते हैं। इसमें भाषा सीखने की प्रक्रिया
अधिक स्वाभाविक और उद्देश्यपूर्ण बन जाती है क्योंकि विद्यार्थी वास्तविक संचार
स्थितियों में भाग लेते हैं।
लाभ:
- संप्रेषण कौशल मजबूत होता है।
- आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
- भाषा का व्यावहारिक उपयोग बढ़ता
है।
- बोलने और सुनने की क्षमता में
सुधार होता है।
- वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में
भाषा प्रयोग करने की क्षमता विकसित होती है।
- समूह कार्य और सहयोग भावना का विकास होता है।
- भाषा सीखना रोचक, सक्रिय
और अर्थपूर्ण बनता है।
सीमाएँ:
- प्रारंभिक स्तर के विद्यार्थियों
के लिए कभी-कभी कठिन हो सकती है।
- अधिक समय और अच्छी योजना की
आवश्यकता होती है।
- सभी विद्यार्थियों की समान
भागीदारी सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- बड़ी कक्षाओं में इसका प्रभावी
संचालन कठिन हो सकता है।
- व्याकरणिक शुद्धता पर कभी-कभी कम
ध्यान दिया जा सकता है।
हिंदी शिक्षण के सिद्धांत
हिंदी
भाषा शिक्षण को प्रभावी, वैज्ञानिक और उद्देश्यपूर्ण बनाने के
लिए कुछ मूलभूत सिद्धांतों का पालन किया जाता है। ये सिद्धांत शिक्षण प्रक्रिया को
व्यवस्थित करते हैं और विद्यार्थियों के सीखने के स्तर को बेहतर बनाते हैं। इनके
माध्यम से भाषा शिक्षण अधिक सरल, रोचक और व्यावहारिक बन जाता है। आधुनिक
शिक्षण व्यवस्था में इन सिद्धांतों का विशेष महत्व है क्योंकि ये विद्यार्थियों को
सक्रिय, समझदार और आत्मनिर्भर सीखने वाला बनाते
हैं। साथ ही ये सिद्धांत शिक्षक को यह मार्गदर्शन देते हैं कि वह किस प्रकार
पाठ्यवस्तु को विद्यार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुँचा सके।
(1) ज्ञात से अज्ञात का सिद्धांत
विद्यार्थी की पहले से ज्ञात जानकारी के आधार पर नई जानकारी दी
जाती है, जिससे सीखना सरल हो जाता है। इस
सिद्धांत में शिक्षक विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान को आधार बनाकर नए पाठ्यांश को
समझाता है। इससे विद्यार्थी नई जानकारी को जल्दी समझते हैं और सीखने में रुचि बढ़ती
है। यह सिद्धांत मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह
विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप शिक्षण को आगे बढ़ाता है। इससे सीखने की
प्रक्रिया तार्किक और क्रमबद्ध बनती है तथा विद्यार्थी नई अवधारणाओं को आसानी से
ग्रहण कर पाते हैं।
(2) सरल से जटिल का सिद्धांत
शिक्षण की शुरुआत सरल विषयों से की जाती है और धीरे-धीरे कठिन
विषयों की ओर बढ़ा जाता है। इस सिद्धांत का उद्देश्य विद्यार्थियों में
आत्मविश्वास बढ़ाना और धीरे-धीरे उनकी समझ को विकसित करना है। सरल से जटिल की
प्रक्रिया सीखने को व्यवस्थित और प्रभावी बनाती है। इससे विद्यार्थी शुरुआत में ही
कठिनाई महसूस नहीं करते और सीखने की प्रक्रिया के प्रति उनका सकारात्मक दृष्टिकोण
विकसित होता है। यह सिद्धांत निरंतर प्रगति को बढ़ावा देता है।
(3) मूर्त से अमूर्त का सिद्धांत
पहले मूर्त उदाहरण
जैसे चित्र, वस्तुएँ और वास्तविक वस्तुएँ दी जाती
हैं, फिर अमूर्त विचारों को समझाया जाता है।
इससे विद्यार्थी देखकर और अनुभव करके सीखते हैं, जिससे
उनकी समझ अधिक स्पष्ट और स्थायी होती है। यह सिद्धांत विशेष रूप से छोटे
विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है क्योंकि वे प्रत्यक्ष अनुभव से जल्दी सीखते
हैं। मूर्त उदाहरणों के माध्यम से जटिल अवधारणाएँ भी सरल हो जाती हैं।
(4) सक्रियता का सिद्धांत
विद्यार्थी स्वयं करके सीखते हैं, जिससे
सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होती है। इस सिद्धांत में विद्यार्थियों को
सक्रिय भागीदारी के अवसर दिए जाते हैं, जैसे
गतिविधियाँ, प्रयोग, चर्चा
आदि। इससे सीखना अधिक रोचक और स्थायी बनता है। सक्रियता से विद्यार्थियों में
आत्मनिर्भरता विकसित होती है और वे केवल सुनने वाले नहीं बल्कि सीखने की प्रक्रिया
में भाग लेने वाले बनते हैं।
(5) अभ्यास का सिद्धांत
भाषा सीखने में निरंतर अभ्यास आवश्यक है क्योंकि अभ्यास से ही
दक्षता विकसित होती है। जितना अधिक विद्यार्थी भाषा का प्रयोग करेंगे, उतनी ही अधिक उनकी शुद्धता और प्रवाह में सुधार होगा। अभ्यास
भाषा कौशलों को मजबूत करता है। यह सिद्धांत भाषा को याद रखने और उसे व्यवहार में
उपयोग करने की क्षमता को बढ़ाता है। नियमित अभ्यास से विद्यार्थी आत्मविश्वासी और
दक्ष बनते हैं।
(6) व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धांत
प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की क्षमता, गति और रुचि अलग होती है, इसलिए
शिक्षण उसी के अनुसार होना चाहिए। शिक्षक को सभी विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को
ध्यान में रखकर शिक्षण देना चाहिए ताकि हर विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार सीख सके।
यह सिद्धांत समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देता है और कमजोर तथा
प्रतिभाशाली दोनों प्रकार के विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा करता है।
(7) जीवन से संबंधितता का सिद्धांत
शिक्षण को वास्तविक जीवन से जोड़ने पर सीखना अधिक उपयोगी और
सार्थक बनता है। जब विद्यार्थी यह समझते हैं कि पढ़ाई का संबंध उनके दैनिक जीवन से
है, तो वे अधिक रुचि के साथ सीखते हैं और
ज्ञान को व्यवहार में लागू करते हैं। यह सिद्धांत शिक्षा को व्यावहारिक बनाता है
और विद्यार्थियों को वास्तविक समस्याओं को हल करने के लिए तैयार करता है।
(8) रुचि का सिद्धांत
यदि शिक्षण रोचक होगा तो विद्यार्थी अधिक ध्यान देंगे और बेहतर
सीखेंगे। इस सिद्धांत के अनुसार शिक्षण में कहानियाँ, उदाहरण,
गतिविधियाँ और रोचक सामग्री का प्रयोग किया जाता है जिससे
विद्यार्थियों की रुचि बनी रहती है और सीखना आसान हो जाता है। रुचि के माध्यम से
विद्यार्थी लंबे समय तक ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और सीखने की प्रक्रिया को
आनंददायक मानते हैं।
इन
सभी सिद्धांतों के पालन से हिंदी भाषा शिक्षण अधिक प्रभावी, व्यवस्थित
और छात्र-केंद्रित बनता है। यह न केवल विद्यार्थियों की भाषायी क्षमता को विकसित
करता है बल्कि उनके व्यक्तित्व विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उचित
सिद्धांतों के प्रयोग से शिक्षण प्रक्रिया सरल, रोचक
और जीवनोपयोगी बन जाती है। इसके परिणामस्वरूप विद्यार्थी भाषा का केवल ज्ञान ही
नहीं प्राप्त करते बल्कि उसे व्यवहार में उपयोग करने में भी सक्षम बनते हैं,
जिससे उनका समग्र विकास सुनिश्चित होता है।
निष्कर्ष
हिंदी भाषा शिक्षण में विभिन्न विधियाँ और सिद्धांत शिक्षण
प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, सरल और उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। इनके उचित प्रयोग से
विद्यार्थियों में सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की चारों प्रमुख भाषायी कौशलों का समुचित और
संतुलित विकास होता है। इससे विद्यार्थी भाषा का केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं
प्राप्त करते, बल्कि उसे व्यवहारिक रूप में उपयोग करने में भी सक्षम बनते
हैं। साथ ही, शिक्षण सिद्धांतों का पालन करके भाषा शिक्षण को अधिक
व्यावहारिक, रोचक और जीवनोपयोगी बनाया जा सकता है। जब शिक्षण वास्तविक जीवन
की परिस्थितियों से जुड़ता है, तो विद्यार्थी उसमें अधिक रुचि लेते हैं
और सीखने की प्रक्रिया अधिक स्थायी बन जाती है। इससे उनकी सोचने-समझने की क्षमता, विश्लेषण
शक्ति और अभिव्यक्ति कौशल में भी निरंतर विकास होता है। आधुनिक
समय में भाषा शिक्षण केवल शैक्षणिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि
यह संप्रेषण क्षमता और व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण माध्यम भी बन गया है।
प्रभावी भाषा शिक्षण विद्यार्थियों में आत्मविश्वास,
सामाजिक समझ और सहयोग की भावना को
बढ़ाता है, जिससे वे समाज में बेहतर संवाद स्थापित कर पाते हैं।
इस प्रकार, हिंदी भाषा शिक्षण केवल एक विषय नहीं
रहकर विद्यार्थियों के समग्र विकास,
सामाजिक संवाद, रचनात्मक
अभिव्यक्ति और जीवन कौशलों के विकास का सशक्त साधन बन जाता है। यह उन्हें न केवल
अच्छे विद्यार्थी बनाता है, बल्कि एक सक्षम,
संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने में
भी सहायता करता है।