Knowledge - Definition, its genesis and general growth from the remote past to 21st Century. ज्ञान - परिभाषा, उत्पत्ति और प्राचीन काल से लेकर 21वीं सदी तक इसका सामान्य विकास
1. प्रस्तावना
(Introduction):
ज्ञान मानव जीवन और
सभ्यता के विकास का मूल आधार रहा है। मानव ने जब से अपने परिवेश को समझने का
प्रयास किया, तभी से ज्ञान की यात्रा आरंभ हुई। प्रारंभिक मानव ने प्रकृति
के साथ निरंतर अंतःक्रिया करते हुए अनुभव प्राप्त किए, उन्हीं अनुभवों से
सीखकर उसने अपने जीवन को अधिक सुरक्षित, संगठित और अर्थपूर्ण बनाया। समय के साथ-साथ
यही अनुभव चिंतन, तर्क और विवेक के माध्यम से ज्ञान के रूप में विकसित होते गए। ज्ञान ने मानव को
केवल जीवित रहने की क्षमता ही नहीं दी, बल्कि उसे सोचने, निर्णय लेने, समस्याओं का समाधान
खोजने और भविष्य की योजना बनाने में भी समर्थ बनाया। समाज की संरचना, सांस्कृतिक परंपराएँ, नैतिक मूल्य, राजनीतिक व्यवस्थाएँ
और आर्थिक प्रणालियाँ—सभी किसी न किसी रूप में ज्ञान पर ही आधारित रही हैं। शिक्षा
के माध्यम से ज्ञान का संरक्षण, संवर्धन और हस्तांतरण होता है, जिससे एक पीढ़ी अपनी
सीख और अनुभव अगली पीढ़ी को सौंपती है। दर्शन ने ज्ञान के स्वरूप और सत्य की खोज पर विचार किया, विज्ञान ने ज्ञान को
प्रयोग और परीक्षण के माध्यम से व्यवस्थित किया, कला ने ज्ञान को
सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की और तकनीक ने ज्ञान को व्यवहारिक जीवन से जोड़ा। इस
प्रकार ज्ञान मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
अतः ज्ञान की अवधारणा, उसकी उत्पत्ति तथा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक और 21वीं शताब्दी तक उसके
ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करना न केवल शैक्षणिक दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि समाज और
शिक्षा को गहराई से समझने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. ज्ञान की अवधारणा एवं परिभाषा (Concept and
Definition of Knowledge):
(i) ज्ञान का अर्थ
(Meaning of Knowledge):
सामान्य अर्थ में ज्ञान एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से
व्यक्ति अपने परिवेश से प्राप्त अनुभवों, तथ्यों और घटनाओं को समझता, उनका विश्लेषण करता
तथा उनसे अर्थ ग्रहण करता है। ज्ञान केवल सूचनाओं का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि उन सूचनाओं को
जोड़कर उनसे निष्कर्ष निकालने, उन्हें व्यवहार में लागू करने और नई
परिस्थितियों में उपयोग करने की क्षमता भी है। सूचना तब ज्ञान का रूप लेती है जब व्यक्ति उसे अपनी पूर्व
अनुभवों और समझ के साथ जोड़कर उसका अर्थ निकालता है। उदाहरण के लिए, किसी तथ्य को जान
लेना सूचना है, किंतु उस तथ्य के कारणों, परिणामों और उपयोग को समझना ज्ञान कहलाता
है। इस प्रकार ज्ञान व्यक्ति की सोच, दृष्टिकोण, निर्णय क्षमता और
व्यवहार को दिशा प्रदान करता है। शिक्षा के संदर्भ में ज्ञान को एक गतिशील और सतत
प्रक्रिया माना जाता है, जो अनुभव, चिंतन और अभ्यास के माध्यम से निरंतर
विकसित होती रहती है।
(ii) ज्ञान
की परिभाषाएँ (Definitions of Knowledge): विभिन्न दार्शनिकों
और विचारधाराओं ने ज्ञान को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है, जिससे ज्ञान की
बहुआयामी प्रकृति स्पष्ट होती है।
प्लेटो (Plato)
के
अनुसार - “ज्ञान वह सत्य विश्वास है जो तर्क
द्वारा प्रमाणित हो।” प्लेटो
ने ज्ञान को सत्य और विश्वास के साथ जोड़ते हुए यह माना कि वही विश्वास ज्ञान
कहलाने योग्य है जो तर्क और विवेक द्वारा प्रमाणित हो। उनके अनुसार, केवल मत या धारणा ज्ञान नहीं है, बल्कि जब कोई विश्वास तार्किक आधार पर
सत्य सिद्ध हो जाता है, तभी वह ज्ञान का रूप ग्रहण करता है। इस
दृष्टिकोण में ज्ञान को स्थायी और सार्वभौमिक सत्य से जोड़ा गया है।
अरस्तू (Aristotle)
के
अनुसार - “ज्ञान वस्तुओं और घटनाओं के कारणों तथा
उनके मूल सिद्धांतों की समझ है।” अरस्तू ने ज्ञान को वस्तुओं और घटनाओं
के कारणों तथा सिद्धांतों की समझ के रूप में देखा। उनके मत में, किसी भी विषय का वास्तविक ज्ञान तब
प्राप्त होता है जब व्यक्ति उसके मूल कारणों, नियमों
और संरचना को समझ लेता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान केवल सतही
जानकारी नहीं, बल्कि गहन और तर्कसंगत समझ का परिणाम
है।
जॉन ड्यूई (John Dewey) के अनुसार
- “ज्ञान अनुभवों की निरंतर पुनर्संरचना और
पुनर्गठन की प्रक्रिया है।” ड्यूई ने ज्ञान को अनुभवों की निरंतर पुनर्संरचना और पुनर्गठन
की प्रक्रिया माना। उनके अनुसार, ज्ञान
स्थिर नहीं होता, बल्कि व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर
उसे लगातार विकसित करता रहता है। समस्या-समाधान, प्रयोग और चिंतन के माध्यम से अनुभव नए अर्थ ग्रहण करते हैं और
यही प्रक्रिया ज्ञान के निर्माण में सहायक होती है। इस दृष्टिकोण में ज्ञान को
व्यवहारिक और जीवन से जुड़ा हुआ माना गया है।
भारतीय दर्शन (Indian
Philosophy) के अनुसार - “प्रमा अर्थात् ज्ञान वह है जो यथार्थ का
सम्यक् एवं सत्य बोध कराए।” भारतीय दर्शन में ज्ञान को ‘प्रमा’
कहा गया है, जिसका अर्थ है यथार्थ का सही और सत्य
बोध। भारतीय चिंतन में ज्ञान को केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं माना गया, बल्कि इसे आत्मबोध और सत्य की अनुभूति
से भी जोड़ा गया है। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द जैसे ज्ञान के विभिन्न
प्रमाण (प्रमाण) भारतीय दर्शन में बताए गए हैं, जो
यह दर्शाते हैं कि ज्ञान अनुभव और विवेक दोनों का परिणाम है।
(iii) शिक्षा के संदर्भ में ज्ञान (Knowledge in the Context of
Education):
शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान को केवल
तथ्यों, सूचनाओं अथवा पाठ्यपुस्तकीय सामग्री के
संकलन तक सीमित नहीं माना जाता। वास्तविक अर्थों में शिक्षा का उद्देश्य ऐसे ज्ञान
का विकास करना है जो शिक्षार्थी की सोचने-समझने की क्षमता को सुदृढ़ बनाए और उसे
स्वतंत्र रूप से विचार करने योग्य बनाए। ज्ञान व्यक्ति को तर्क करना, कारण-परिणाम के संबंधों को समझना तथा
विभिन्न परिस्थितियों में विवेकपूर्ण और तर्कसंगत निर्णय लेने में सहायता करता है।
इस प्रकार ज्ञान शिक्षार्थी के बौद्धिक विकास की आधारशिला बनता है और उसकी समझ को
सतही स्तर से गहन स्तर तक ले जाता है।
आधुनिक शैक्षिक दृष्टिकोण में ज्ञान को
सक्रिय और रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। शिक्षार्थी जब अपने पूर्व
अनुभवों, अर्जित सूचनाओं और नए विचारों के बीच
संबंध स्थापित करता है, तब ज्ञान का वास्तविक निर्माण होता है।
समस्या-समाधान, खोज, प्रयोग
और संवाद के माध्यम से ज्ञान अधिक अर्थपूर्ण बनता है। इस प्रक्रिया में शिक्षार्थी
केवल सीखने वाला नहीं रहता,
बल्कि स्वयं ज्ञान का निर्माता बन जाता
है, जिससे सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी
और स्थायी हो जाती है। शिक्षा के माध्यम से प्राप्त ज्ञान का
सामाजिक जीवन से जुड़ा होना भी अत्यंत आवश्यक है। ऐसा ज्ञान जो सामाजिक समस्याओं
को समझने, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित
करने और सामूहिक हित में कार्य करने की प्रेरणा देता है, वही सार्थक माना जाता है। ज्ञान व्यक्ति
में सामाजिक उत्तरदायित्व,
सहयोग, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों का विकास करता है, जिससे वह समाज का एक जागरूक और
जिम्मेदार सदस्य बन सके।
इसके अतिरिक्त, शिक्षा में ज्ञान का उद्देश्य
शिक्षार्थियों में रचनात्मकता, आलोचनात्मक
चिंतन और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। आलोचनात्मक ज्ञान व्यक्ति को किसी भी
जानकारी को बिना जाँच-परख के स्वीकार करने के बजाय उस पर प्रश्न करने और तर्कसंगत
विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करता है। वहीं रचनात्मक ज्ञान नए विचारों, नवाचार और मौलिक चिंतन को प्रोत्साहित
करता है। जब ज्ञान व्यवहार में उतरकर मानवीय मूल्यों, नैतिकता और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को
सुदृढ़ करता है, तब वह केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन न
रहकर समाज के समग्र विकास का आधार बन जाता है। इस प्रकार शिक्षा के संदर्भ में
ज्ञान को एक सतत, गतिशील, जीवनोपयोगी तथा समाजोन्मुख प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है।
3. ज्ञान की उत्पत्ति (Genesis of Knowledge):
मानव जीवन में ज्ञान का प्रारंभ उसकी
प्राकृतिक जिज्ञासा और अनुभव से हुआ। प्राचीन काल से ही मानव ने अपने चारों ओर के
प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण को समझने का प्रयास किया है। यह प्रयास न केवल उसके
दैनिक जीवन के लिए उपयोगी था, बल्कि
उससे वह भविष्य की संभावनाओं का पूर्वानुमान लगाने, प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक समस्याओं से निपटने में सक्षम
हुआ। ज्ञान केवल जन्मजात नहीं होता, बल्कि
अनुभव, विश्लेषण, तर्क और सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से लगातार विकसित होता
है। मानव ने अपने जीवन की समस्याओं को हल करने, प्राकृतिक
परिस्थितियों में अनुकूलन करने और समाज के भीतर सहयोग स्थापित करने के लिए ज्ञान
का निरंतर विकास किया। इस विकास की प्रक्रिया में सीखने और समझने की प्रवृत्ति का
सतत योगदान रहा है, जिसने मानव सभ्यता के निर्माण में
आधारशिला का काम किया।
(i) अनुभव (Experience)
अनुभव ज्ञान का प्राथमिक और सबसे
महत्वपूर्ण स्रोत है। यह इंद्रियों – दृष्टि, श्रवण, स्पर्श,
स्वाद और गंध – के माध्यम से प्राप्त जानकारी पर आधारित
होता है। अनुभव व्यक्ति को वास्तविक जीवन की घटनाओं और प्रक्रियाओं से प्रत्यक्ष
परिचय कराता है। यह केवल बाहरी सूचना का संग्रह नहीं है, बल्कि इसे समझने, उसका विश्लेषण करने और उसे व्यवहार में
लागू करने की क्षमता प्रदान करता है। अनुभव के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन
में निर्णय लेता है, समस्याओं का समाधान करता है और नई समझ
विकसित करता है। इसके अलावा, अनुभव
का आदान-प्रदान समाज में सामूहिक ज्ञान के निर्माण में योगदान करता है, जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का संचरण
होता है। अनुभव का महत्व इस बात में भी है कि यह शिक्षार्थी
को अपने परिवेश से सीखने,
प्रयोग करने और खोजपूर्ण दृष्टिकोण
विकसित करने में सक्षम बनाता है। बिना अनुभव के ज्ञान केवल सैद्धांतिक रह जाता है
और जीवन की जटिलताओं का समाधान नहीं कर सकता।
(ii)
तर्क (Reason) - अनुभव से प्राप्त
ज्ञान तभी सुसंगत और स्थायी बनता है जब उसे तर्क और विवेचना के माध्यम से परखा और
व्यवस्थित किया जाए। तर्क का अर्थ है किसी घटना, तथ्य या सूचना पर
विचार करना, उनका विश्लेषण करना और उनके बीच संबंध स्थापित करके निष्कर्ष
निकालना। तर्कशील दृष्टिकोण ज्ञान को केवल संचयित करने का माध्यम नहीं बनाता, बल्कि उसे व्यवस्थित, सुसंगत और
व्यावहारिक बनाता है। तर्क से व्यक्ति न केवल अपनी समझ बढ़ाता है, बल्कि समस्याओं के
समाधान में सृजनात्मक और निपुण बनता है। यह उसे नई परिस्थितियों का सामना करने, विकल्पों का
मूल्यांकन करने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
(iii) प्रयोग और परीक्षण (Experimentation
and Testing) - वैज्ञानिक दृष्टिकोण में ज्ञान का विकास मुख्यतः प्रयोग और
परीक्षण के माध्यम से होता है। मानव ने प्राकृतिक घटनाओं और नियमों को समझने के
लिए सतत प्रयोग किए, परिणामों का विश्लेषण किया और निष्कर्ष निकाले। यह प्रक्रिया
ज्ञान को केवल स्थिर तथ्य नहीं रहने देती, बल्कि उसे परिष्कृत, संशोधित और अद्यतन
बनाती रहती है। प्रयोग और परीक्षण
केवल विज्ञान और तकनीक तक सीमित नहीं हैं। सामाजिक व्यवहार, कला, भाषा और सांस्कृतिक
गतिविधियों में भी अनुभवों के आधार पर परीक्षण और प्रयोग के माध्यम से नए ज्ञान की
खोज होती है। इस प्रकार, प्रयोग और परीक्षण ज्ञान को सक्रिय, जीवंत और व्यवहारिक
बनाते हैं।
(iv) सामाजिक अंतःक्रिया (Social
Interaction) - ज्ञान केवल व्यक्तिगत प्रयास से नहीं विकसित होता, बल्कि समाज, भाषा और संस्कृति के
माध्यम से भी इसका प्रसार और संवर्धन होता है। भाषा विचारों, अनुभवों और ज्ञान को
साझा करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। समाज में शिक्षा, परंपराएं, रीति-रिवाज और
सांस्कृतिक आदान-प्रदान ज्ञान को संरक्षित और विस्तारित करते हैं। सामाजिक अंतःक्रिया से ज्ञान व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर
सामूहिक समझ में परिवर्तित होता है। व्यक्ति के अनुभव और विचार अन्य लोगों के
अनुभवों के साथ जुड़ते हैं और समाज में साझा ज्ञान का निर्माण करते हैं। इस
प्रक्रिया के माध्यम से न केवल ज्ञान का संचरण होता है, बल्कि नए दृष्टिकोण, संशोधन और नवाचार भी
जन्म लेते हैं।
(v) भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian
Knowledge Tradition) - भारतीय परंपरा में ज्ञान की उत्पत्ति को व्यापक और गहन
दृष्टिकोण से देखा गया है। यहां ज्ञान केवल भौतिक या बाहरी अनुभव तक सीमित नहीं
है। श्रुति (वेद, उपनिषद और अन्य प्राचीन ग्रंथ), स्मृति (पूर्वजों के
अनुभव और शिक्षाएँ), ध्यान, साधना और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से ज्ञान का विकास माना
गया है। भारतीय दर्शन में
ज्ञान को जीवन, नैतिकता, समाज और आध्यात्मिकता से जोड़ा गया है। इसे
केवल सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा के विकास के रूप में देखा
जाता है। इस दृष्टि में ज्ञान व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार, विवेकपूर्ण निर्णय
और सामाजिक जिम्मेदारी के लिए तैयार करता है। साथ ही यह ज्ञान न केवल व्यक्तिगत
उन्नति का साधन है, बल्कि समाज के समग्र विकास, नैतिकता और
संस्कारों के संवर्धन का भी माध्यम बनता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक
विकास नहीं, बल्कि जीवनोपयोगी, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से संतुलित
व्यक्तित्व का निर्माण करना भी माना गया है।
4. प्राचीन काल में ज्ञान का विकास (Knowledge in Ancient Period):
प्राचीन काल में ज्ञान का विकास विभिन्न
सभ्यताओं और परंपराओं के सामाजिक, धार्मिक
और दार्शनिक परिवेश में हुआ। इस काल में ज्ञान का उद्देश्य केवल सूचना का संग्रह
नहीं था, बल्कि जीवन के वास्तविक उद्देश्य, नैतिकता, आत्मबोध और सामाजिक व्यवस्था को समझना भी था। अलग-अलग
क्षेत्रों और संस्कृतियों में ज्ञान की परंपरा और विकास की प्रक्रिया में
विशेषताएँ और दृष्टिकोण अलग-अलग थे।
(i) भारतीय परंपरा (Indian
Tradition)
भारतीय परंपरा में ज्ञान का विकास
अत्यंत गहन और समग्र दृष्टिकोण से हुआ। यहाँ ज्ञान केवल बाहरी अनुभव या तर्क तक
सीमित नहीं था, बल्कि इसे आत्मबोध, मोक्ष और जीवन के उच्चतम उद्देश्य से
जोड़ा गया। वेद, उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथों में ज्ञान
को जीवन के आध्यात्मिक और नैतिक पहलुओं के विकास के साधन के रूप में प्रस्तुत किया
गया। गुरुकुल
प्रणाली में शिक्षा और ज्ञान का आदान-प्रदान मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से
होता था। शिष्य अपने गुरु से प्रत्यक्ष संवाद, वाचन
और स्मरण के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करते थे। इस प्रणाली में न केवल सैद्धांतिक
ज्ञान, बल्कि व्यवहारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षाएँ भी
शामिल थीं। भारतीय दर्शन में विभिन्न स्कूलों ने
ज्ञान की विशेष अवधारणा प्रस्तुत की। सांख्य दर्शन ने प्रकृति और पुरुष के
विश्लेषण के माध्यम से ज्ञान का विवेचन किया, योग
दर्शन ने मानसिक और आत्मिक अनुशासन से ज्ञान की प्राप्ति पर बल दिया, वेदांत ने ब्रह्म और आत्मा के सम्बन्ध
में गहन चिंतन प्रस्तुत किया। बौद्ध और जैन दर्शन ने तर्क, अनुभव और नैतिक जीवन के माध्यम से ज्ञान
को आत्मसाक्षात्कार और समाजोपयोगी बनाने पर जोर दिया। इस प्रकार भारतीय परंपरा में
ज्ञान का विकास आत्मिक, नैतिक और बौद्धिक पहलुओं का सम्मिश्रण
था।
(ii) यूनानी परंपरा (Greek
Tradition)
यूनानी परंपरा में ज्ञान का विकास
मुख्यतः तर्क, दर्शन और नैतिक चिंतन पर आधारित था।
सुकरात (Socrates) ने प्रश्न और संवाद के माध्यम से ज्ञान
की खोज करने की पद्धति अपनाई, जिससे
व्यक्ति अपने स्वयं के ज्ञान और अज्ञानता का बोध कर सके। प्लेटो (Plato) ने ज्ञान को सत्य और न्याय की खोज के
रूप में देखा, और विचारों की दुनिया में उच्चतम सच्चाई
की पहचान पर बल दिया। अरस्तू (Aristotle) ने
तर्क, विश्लेषण और अनुभव के माध्यम से ज्ञान
के व्यवस्थित ढांचे का विकास किया। यूनानी दर्शन में ज्ञान का उद्देश्य
केवल सूचना प्राप्त करना नहीं था, बल्कि
व्यक्ति की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी, न्याय
और जीवन के सर्वोच्च मूल्य को समझना भी था। यहाँ ज्ञान को जीवन के उद्देश्य, नीति और सामूहिक भलाई से जोड़ा गया। यह
दृष्टिकोण पश्चिमी शिक्षा और विज्ञान की नींव बना, जिसने तर्क, अनुभव
और दर्शन को ज्ञान की केंद्रीय प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया।
(iii) चीन और मिस्र (China
and Egypt)
चीन और मिस्र की सभ्यताओं में ज्ञान का
विकास मुख्यतः नैतिकता, सामाजिक अनुशासन और प्रायोगिक विज्ञान
के क्षेत्र में हुआ। चीन में कन्फ्यूशियस (Confucius) ने नैतिक और सामाजिक ज्ञान पर बल दिया। उनका दृष्टिकोण यह था
कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि सामाजिक सामंजस्य, कर्तव्यपालन
और परिवार एवं राज्य के नैतिक संचालन में योगदान देना है।
मिस्र में ज्ञान का विकास खगोल, गणित, चिकित्सा और वास्तुकला के क्षेत्र में हुआ। मिस्रवासियों ने
प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन, वर्षा, नदी नील और मौसम के पैटर्न को समझने के
लिए गणित और खगोल विज्ञान का विकास किया। चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी
उनके प्रयोग और अनुभव ज्ञान का महत्वपूर्ण स्रोत बने। यहाँ ज्ञान का उद्देश्य जीवन
की गुणवत्ता बढ़ाना, प्राकृतिक संसाधनों का समझदारी से उपयोग
करना और समाज में संरचना स्थापित करना था। इस प्रकार प्राचीन सभ्यताओं में ज्ञान
का विकास बहुआयामी था। भारतीय परंपरा ने इसे आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से, यूनानी परंपरा ने तर्क और दर्शन के
दृष्टिकोण से, और चीन-मिस्र ने सामाजिक, प्रायोगिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से
संवर्धित किया। इन सभी परंपराओं ने मिलकर मानव सभ्यता में ज्ञान की नींव रखी, जो आने वाले कालों में विज्ञान, दर्शन और शिक्षा के विकास का आधार बनी।
5.
मध्यकाल में ज्ञान का विकास (Medieval Period):
मध्यकाल में ज्ञान का विकास सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कारकों से गहरे
प्रभावित था। इस काल में ज्ञान का केन्द्र केवल व्यक्तिगत सोच या तर्क नहीं रहा, बल्कि धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों के
माध्यम से संरक्षित और प्रसारित हुआ। इस काल में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों ने
ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे
शिक्षा, दर्शन, विज्ञान और कला का व्यापक विकास हुआ।
(i) धार्मिक प्रभाव (Religious Influence)
मध्यकाल में ज्ञान का विकास धार्मिक
विचारों और संस्थानों के माध्यम से हुआ। धार्मिक ग्रंथों, शिक्षाओं और संस्थाओं ने ज्ञान के
संरक्षण और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ईसाई धर्म में चर्च और मठ ज्ञान
के मुख्य केंद्र बने। चर्च के स्कूलों और स्क्रिप्टोरियम (scriptorium) में धर्मग्रंथों का अध्ययन, अनुवाद और प्रतिलिपि बनाना ज्ञान के
आदान-प्रदान का प्रमुख साधन था। इस्लामिक और हिन्दू समाज में भी धार्मिक
संस्थानों ने शिक्षा और ज्ञान के विकास में योगदान दिया। धार्मिक दृष्टिकोण से
ज्ञान को केवल सूचना के रूप में नहीं, बल्कि
जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहलुओं से जोड़कर
देखा गया। इस प्रकार, मध्यकाल में धर्म ने ज्ञान के
आदान-प्रदान के लिए संरचना और दिशा प्रदान की, जिससे
समाज में शिक्षा का प्रसार और सांस्कृतिक पहचान बनी।
(ii) इस्लामी योगदान (Islamic Contribution)
मध्यकाल में इस्लामी सभ्यता ने गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण
योगदान दिया। इस्लामी विद्वानों ने प्राचीन यूनानी, भारतीय और फारसी ज्ञान को संगृहीत किया, उसका अनुवाद किया और उसमें नवाचार किया।
अल-फाराबी (Al-Farabi) ने दर्शन और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में
महत्वपूर्ण योगदान दिया। इब्न-सीना (Ibn Sina) ने चिकित्सा और विज्ञान में अग्रणी शोध किए, जिनकी पुस्तकें सदियों तक विश्वभर में
शिक्षा का आधार बनीं। अल-बेरूनी (Al-Biruni) ने खगोल, गणित, भूगोल और इतिहास के क्षेत्र में
अद्वितीय शोध किया। इन विद्वानों ने ज्ञान के विश्वव्यापी आदान-प्रदान में योगदान
दिया और मध्यकालीन समाज में शिक्षा और विज्ञान के मानक स्थापित किए।
(iii) भारत में (In
India)
भारत में मध्यकाल में ज्ञान का विकास
मुख्यतः विश्वविद्यालयों,
शिक्षण संस्थानों और धार्मिक-दार्शनिक
केन्द्रों के माध्यम से हुआ। नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित
केन्द्र शिक्षा और ज्ञान के प्रसार में अग्रणी रहे। इन विश्वविद्यालयों में वेद, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित और कला का अध्ययन होता था।
भारत में इस काल में ज्योतिष शास्त्र और
आयुर्वेद के क्षेत्र में गहन शोध हुआ। दर्शन के विभिन्न स्कूलों—जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग—ने
तर्क, अनुभव और जीवनोपयोगी ज्ञान के माध्यम से
मानव जीवन के सभी पहलुओं को समझने का प्रयास किया। इन केन्द्रों में शिक्षार्थियों
को बहु-विषयक शिक्षा दी जाती थी, जिससे
ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि
व्यावहारिक और सामाजिक उपयोगिता से भी भरपूर होता था।
मध्यकाल में ज्ञान का यह विकास धार्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक प्रभावों के मिश्रण से संभव हुआ। इस काल के विद्वानों और संस्थानों ने न केवल प्राचीन ज्ञान का संरक्षण किया, बल्कि उसमें नवीन दृष्टिकोण और प्रयोग जोड़कर उसे समृद्ध किया। इस प्रकार, मध्यकाल ने आधुनिक शिक्षा, दर्शन और विज्ञान के विकास के लिए ठोस आधार तैयार किया।
6. आधुनिक
काल में ज्ञान का विकास (Modern Period):
आधुनिक काल में ज्ञान का विकास मानव सभ्यता
के कई क्षेत्रों में तीव्र और व्यवस्थित हुआ। इस काल में ज्ञान केवल धार्मिक या
पारंपरिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तर्क, प्रयोग और स्वतंत्र
चिंतन के माध्यम से उसका विस्तार हुआ। पुनर्जागरण, वैज्ञानिक क्रांति
और ज्ञानोदय ने ज्ञान के स्वरूप, उद्देश्य और प्रसार के तरीके में ऐतिहासिक
बदलाव लाए।
(i) पुनर्जागरण (Renaissance)
पुनर्जागरण यूरोप में 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और बौद्धिक
आंदोलन था। इस काल में मानववाद (Humanism) का
उदय हुआ, जिसने ज्ञान को केवल धार्मिक या
पारंपरिक दृष्टि से देखने की बजाय मानव के अनुभव, क्षमताओं और मूल्य पर केंद्रित किया।
कला, साहित्य, विज्ञान और दर्शन में इस काल के
विद्वानों ने नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। मानव की प्रतिभा, तर्क और रचनात्मकता को प्राथमिकता दी
गई। चित्रकला, स्थापत्य, संगीत और साहित्य में नवाचार हुआ, वहीं विज्ञान में प्राकृतिक घटनाओं का
निरीक्षण, विश्लेषण और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर
शोध बढ़ा। पुनर्जागरण ने ज्ञान को स्वतंत्र, वैज्ञानिक
और मानव केंद्रित दृष्टिकोण से देखने की नींव रखी।
(ii) वैज्ञानिक
क्रांति (Scientific
Revolution)
16वीं और 17वीं शताब्दी में वैज्ञानिक क्रांति ने ज्ञान के स्वरूप में
क्रांतिकारी परिवर्तन किया। इस दौर में प्रयोग और वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) पर विशेष बल दिया गया। कोपरनिकस (Copernicus) ने सौरमंडल के केंद्र में सूर्य की
स्थिति बताकर खगोल विज्ञान में नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। गैलीलियो (Galileo) ने दूरबीन और प्रेक्षण के माध्यम से
खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया, जिससे
अनुभव और प्रयोग का महत्व बढ़ा। न्यूटन (Newton) ने गुरुत्वाकर्षण के नियम और गति के सिद्धांतों को प्रतिपादित
करके भौतिकी के क्षेत्र में ज्ञान का आधार तैयार किया। इस काल में ज्ञान केवल
अनुमान या परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि
उसका मूल आधार निरीक्षण, प्रयोग, प्रमाण और तर्कशील विश्लेषण बन गया। वैज्ञानिक क्रांति ने
आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा के विकास के लिए
मार्ग प्रशस्त किया।
(iii) ज्ञानोदय (Enlightenment)
17वीं और 18वीं शताब्दी में ज्ञानोदय (Enlightenment) ने विवेक, स्वतंत्र
सोच और मानव अधिकारों के महत्व पर जोर दिया। इस काल में ज्ञान का उद्देश्य केवल
सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि सोचने-समझने की क्षमता, तर्कशीलता और स्वतंत्र विचार को विकसित
करना था। डेसकार्टेस (Descartes) ने “मैं
सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ” के माध्यम से ज्ञान के तार्किक और
विचारशील आधार को स्थापित किया। जॉन लॉक (John Locke) ने अनुभव और पर्यावरण के माध्यम से शिक्षा और ज्ञान के विकास
पर बल दिया। कांट (Immanuel
Kant) ने
तर्क, विवेक और नैतिकता के माध्यम से ज्ञान की
सीमाओं और उसकी सार्वभौमिकता का विश्लेषण किया। इस काल में ज्ञान व्यक्तिगत
स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता के
लिए मार्गदर्शक बन गया। आधुनिक काल में ज्ञान का यह विकास
सामाजिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोणों के
मिश्रण से हुआ। पुनर्जागरण ने मानव केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, वैज्ञानिक क्रांति ने प्रयोग और तर्क की
विधि को स्थापित किया और ज्ञानोदय ने स्वतंत्र चिंतन और विवेकशीलता को महत्व दिया।
इस प्रकार आधुनिक काल में ज्ञान ने मानव समाज, शिक्षा
और विज्ञान में स्थायी और व्यापक परिवर्तन किए।
(iv) शिक्षा में परिवर्तन (Changes in
Education)
आधुनिक काल में ज्ञान के विकास के
साथ-साथ शिक्षा के स्वरूप और उद्देश्य में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। अब शिक्षा
केवल तथ्यों और सूचनाओं के संचय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे व्यवस्थित, संरचित
और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर प्रस्तुत किया जाने लगा:-
ज्ञान को वस्तुनिष्ठ और व्यवस्थित रूप देना (Objectification
and Systematization of Knowledge)
शिक्षा में परिवर्तन के प्रमुख पहलुओं
में से एक यह है कि ज्ञान को अब स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ
और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। विषयों और अवधारणाओं को संरचित
तरीके से क्रमबद्ध किया गया, ताकि
छात्र उन्हें आसानी से समझ सकें और उनका व्यावहारिक उपयोग कर सकें।
इस परिवर्तन का उद्देश्य केवल जानकारी
प्रदान करना नहीं था, बल्कि छात्रों की सोचने, विश्लेषण करने और समस्याओं का समाधान
निकालने की क्षमता को विकसित करना था। ज्ञान को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने
से यह सुनिश्चित किया गया कि सीखने की प्रक्रिया तार्किक, संगठित और लक्ष्य-केंद्रित हो।
विषय आधारित अनुशासन (Disciplines)
शिक्षा के इस नए स्वरूप में विषय आधारित
अनुशासन (Disciplines) का महत्व बढ़ गया। प्रत्येक विषय को एक
स्वतंत्र अनुशासन के रूप में विकसित किया गया, जिसमें
सिद्धांत, प्रक्रियाएँ, नियम और प्रयोग शामिल थे। उदाहरण स्वरूप, विज्ञान, गणित,
समाजशास्त्र, भाषा और दर्शन जैसे विषयों ने न केवल
जानकारी प्रदान की, बल्कि बौद्धिक कौशल, तर्क, विश्लेषण और प्रयोगात्मक दृष्टिकोण को भी बढ़ावा दिया।
विषय आधारित अनुशासन ने शिक्षा में
संरचना और स्पष्टता प्रदान की। इससे छात्रों को यह समझने में मदद मिली कि ज्ञान
केवल याद करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि
यह समझने, मूल्यांकन करने और नए विचार विकसित करने
का साधन है।
शिक्षा अब केवल पारंपरिक ज्ञान संचय
नहीं रही, बल्कि यह व्यक्तित्व, सोचने की क्षमता और समाजोपयोगी कौशल के
विकास का माध्यम बन गई। इस प्रकार, शिक्षा में परिवर्तन ने ज्ञान के स्वरूप
को अधिक व्यवस्थित, तार्किक और व्यावहारिक बना दिया। ज्ञान
अब केवल अघटक सूचना नहीं रहा, बल्कि
यह छात्रों के बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास का मार्गदर्शक
बन गया। विषय आधारित अनुशासन और वस्तुनिष्ठ प्रस्तुतिकरण ने शिक्षा को जीवनोपयोगी, प्रभावी और सार्वभौमिक बनाने में
महत्वपूर्ण योगदान दिया।
7. 19वीं–20वीं
शताब्दी में ज्ञान (19th–20th
Century):
(i) औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) - 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति ने मानव
समाज के हर पहलू पर गहरा प्रभाव डाला। भाप इंजन, मशीनरी और नई उत्पादन तकनीकों के आविष्कार ने कृषि प्रधान समाज
को औद्योगिक समाज में बदल दिया। इससे न केवल उत्पादन की गति और मात्रा में वृद्धि
हुई, बल्कि नई तकनीकों के लिए वैज्ञानिक
अनुसंधान और प्रयोगों की आवश्यकता भी उत्पन्न हुई। उदाहरणस्वरूप, लोहे और इस्पात के उत्पादन, रेलमार्ग निर्माण, और बिजली व दूरसंचार तकनीक में आए
बदलावों ने ज्ञान के प्रसार को भी तेज किया। शहरीकरण और कामकाजी वर्ग की बढ़ती
संख्या ने सामाजिक समस्याओं और आर्थिक संरचनाओं पर नए प्रश्न खड़े किए, जिससे समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में
गहन अध्ययन की शुरुआत हुई। इस काल में तकनीकी दक्षता, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामाजिक सुधार के
बीच संतुलन स्थापित करने का मार्ग विकसित हुआ।
(ii) विषयों का विशेषीकरण (Specialization of Subjects) - 19वीं और 20वीं सदी में ज्ञान के क्षेत्रों में गहरा विभाजन और विशेषज्ञता
का उदय हुआ। यह दौर विज्ञान और मानविकी दोनों के लिए महत्वपूर्ण था। भौतिक विज्ञान
में न्यूटन, मैक्सवेल और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों
ने अपने सिद्धांत विकसित किए, जबकि
रसायन विज्ञान और जीवविज्ञान में प्रयोगों और प्रयोगशालाओं का महत्व बढ़ा।
समाजशास्त्र में कॉन्ट, मार्क्स और डर्बिन जैसे विचारकों ने
समाज की संरचना, वर्ग और आर्थिक प्रणाली का अध्ययन किया।
इसी प्रकार, गणित, मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र ने अपनी विधाओं और अनुसंधान
पद्धतियों को स्वतंत्र रूप से स्थापित किया। इस विशेषीकरण ने न केवल गहन अनुसंधान
को संभव बनाया, बल्कि विशेषज्ञों के नेटवर्क और
अंतरविषयक अध्ययन के नए मार्ग भी खोले।
(iii) समाज विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान का
विस्तार (Expansion of Social and Natural Sciences) इस समय प्राकृतिक विज्ञान और समाज
विज्ञान दोनों में अभूतपूर्व विकास हुआ। भौतिक विज्ञान और जैव विज्ञान में
प्रयोगात्मक और परीक्षण आधारित अध्ययन ने नई खोजों को जन्म दिया। उदाहरण के लिए, चार्ल्स डार्विन का विकासवाद, ग्रेगोर मेंडेल का आनुवंशिकी में योगदान
और माइकल फैराडे के विद्युत एवं चुंबकत्व के प्रयोग ने प्राकृतिक विज्ञान की दिशा
बदल दी। इसी तरह समाज विज्ञान ने मानव व्यवहार, सामाजिक
संरचना और राजनीति के अध्ययन के लिए विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाया। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, मानवशास्त्र और राजनीति विज्ञान में
डेटा संग्रह, सर्वेक्षण और सांख्यिकीय विश्लेषण ने
ज्ञान को पारंपरिक अनुभव और कथाओं से बाहर निकालकर वैज्ञानिक, तार्किक और व्यवस्थित रूप दिया।
(iv) व्यवहारवाद, संरचनावाद और रचनावाद (Behaviorism, Structuralism, and
Constructivism) - 19वीं–20वीं सदी में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र
में कई दार्शनिक दृष्टिकोण विकसित हुए:-
·
व्यवहारवाद (Behaviorism) ने यह मान्यता दी कि सीखने की प्रक्रिया बाहरी अनुभवों और
पर्यावरणीय उत्तेजनाओं के माध्यम से होती है। उदाहरणस्वरूप, बी. एफ. स्किनर ने व्यवहारवादी सिद्धांतों
के आधार पर शिक्षण और प्रशिक्षण की विधियों को विकसित किया।
·
संरचनावाद (Structuralism) ने ज्ञान को मानव मस्तिष्क की संरचनाओं और मानसिक प्रक्रियाओं
के आधार पर समझने का प्रयास किया। विल्हेम वुंट और अन्य संरचनावादी विद्वानों ने
अनुभव और चेतना के विश्लेषण पर जोर दिया।
·
रचनावाद (Constructivism) ने ज्ञान को सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से
निर्मित होने वाली प्रक्रिया माना। जीन पियाजे और लेव
विगोत्स्की ने यह दिखाया कि सीखना केवल जानकारी
ग्रहण करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति अपने अनुभवों और सामाजिक
बातचीत के माध्यम से ज्ञान का निर्माण करता है। ये दृष्टिकोण शिक्षा और मनोविज्ञान
में अनुसंधान, शिक्षण तकनीक और पाठ्यक्रम निर्माण की
दिशा को गहराई से प्रभावित करने लगे।
(v) शिक्षा में पाठ्यक्रम आधारित ज्ञान (Curriculum-Based Knowledge in
Education) - 19वीं–20वीं
सदी में शिक्षा का स्वरूप व्यवस्थित और पाठ्यक्रम आधारित हुआ। स्कूलों और
विश्वविद्यालयों में विषयवार पाठ्यक्रम विकसित किए गए, जो छात्रों को प्रत्येक विषय की
सिद्धांतगत समझ, व्यावहारिक ज्ञान और विश्लेषणात्मक
क्षमता प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए, गणित
और विज्ञान में प्रयोगशाला आधारित शिक्षण को अनिवार्य किया गया, जबकि समाजशास्त्र और इतिहास में
शोध-आधारित प्रोजेक्ट और केस स्टडी को महत्व दिया गया। पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा ने
शिक्षा को केवल जानकारी प्रदान करने की प्रक्रिया से ऊपर उठाकर, छात्रों में तार्किक सोच, समस्या समाधान की क्षमता और वैज्ञानिक
दृष्टिकोण विकसित करने का माध्यम बना दिया। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षा ने समाज में व्यक्तियों को सशक्त, जागरूक और विश्लेषणात्मक सोच वाले
नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
8. 21वीं
शताब्दी में ज्ञान की प्रकृति (Knowledge in the 21st Century):
(i) ज्ञान आधारित समाज (Knowledge-Based Society) - 21वीं शताब्दी को सही
अर्थों में सूचना समाज का युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल में
सूचना का सृजन, संग्रहण, प्रसंस्करण और प्रसार अभूतपूर्व गति से हो
रहा है। इंटरनेट, मोबाइल तकनीक, डिजिटल मीडिया और सोशल नेटवर्किंग
प्लेटफॉर्म ने ज्ञान और सूचना को विशिष्ट संस्थानों या वर्गों तक सीमित न रखकर आम
जन तक सुलभ बना दिया है। आज सूचना केवल सीखने का साधन नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक चेतना, आर्थिक नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों
और राजनीतिक विमर्श की दिशा तय करने वाली शक्ति बन चुकी है। सूचना तक त्वरित पहुँच
ने नागरिकों को अधिक जागरूक, सक्रिय और सहभागी बनाया है, जिससे लोकतांत्रिक
प्रक्रियाएँ भी अधिक प्रभावी हुई हैं। आधुनिक युग में
आर्थिक विकास का आधार भौतिक संसाधनों से हटकर ज्ञान, नवाचार और मानव पूँजी पर केंद्रित हो गया
है। ज्ञान अर्थव्यवस्था में शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और
तकनीकी दक्षता को केंद्रीय महत्व दिया जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग, बायोटेक्नोलॉजी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्ट-अप संस्कृति
और नवाचार आधारित उद्यम इस अर्थव्यवस्था के प्रमुख उदाहरण हैं। इस संदर्भ में
ज्ञान केवल बौद्धिक संपदा नहीं, बल्कि उत्पादन, प्रतिस्पर्धा और
वैश्विक नेतृत्व का प्रमुख स्रोत बन गया है, जिससे राष्ट्रों की प्रगति का मापदंड भी
बदल गया है।
(ii) डिजिटल
और तकनीकी ज्ञान (Digital
and Technological Knowledge) - 21वीं सदी में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी
(ICT)
ने ज्ञान के स्वरूप, संरचना और अधिगम की
प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग, डेटा विश्लेषण और
स्वचालन ने ज्ञान के निर्माण, विश्लेषण और उपयोग को अधिक सटीक और प्रभावी
बनाया है। ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से शिक्षार्थी भौगोलिक सीमाओं से
मुक्त होकर, अपनी गति और रुचि के अनुसार सीखने में सक्षम हुए हैं। डिजिटल
तकनीक ने शिक्षा को अधिक लचीला, सहभागी, व्यक्तिगत और अनुभव आधारित बना दिया है, जिससे सीखना आजीवन
प्रक्रिया का रूप ले रहा है। ई-लर्निंग और Massive Open
Online Courses (MOOCs) ने शिक्षा के क्षेत्र में लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा दिया है।
विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और विशेषज्ञों
द्वारा प्रस्तुत ऑनलाइन पाठ्यक्रमों ने उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा को व्यापक
जनसमूह तक पहुँचाया है। इससे शिक्षा की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक
बाधाएँ काफी हद तक कम हुई हैं।
(iii) अंतःविषयक ज्ञान (Interdisciplinary Knowledge) - 21वीं शताब्दी की
वैश्विक समस्याएँ—जैसे पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य चुनौतियाँ
और सामाजिक असमानता—के समाधान के लिए किसी एक विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है।
बहुविषयक (Multidisciplinary) और अंतःविषयक (Interdisciplinary)
दृष्टिकोण विभिन्न
विषयों के ज्ञान, विधियों और दृष्टियों को जोड़कर समग्र समझ विकसित करते हैं।
इससे ज्ञान अधिक व्यावहारिक, समन्वित और समस्या-उन्मुख बनता है तथा
वास्तविक जीवन की जटिलताओं से बेहतर ढंग से निपटने में सहायता मिलती है। STEM और STEAM शिक्षा मॉडल
अंतःविषयक ज्ञान का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। STEM शिक्षा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित
को एकीकृत करके तार्किक सोच और तकनीकी दक्षता विकसित करती है, जबकि STEAM में कला को शामिल कर
रचनात्मकता, सौंदर्यबोध और मानवीय संवेदनाओं को भी महत्व दिया जाता है। इन
मॉडलों के माध्यम से छात्रों में नवाचार, समस्या-समाधान और कल्पनाशीलता जैसी 21वीं सदी की आवश्यक
क्षमताएँ विकसित होती हैं।
(iv) रचनावादी
दृष्टिकोण (Constructivist
Approach) - 21वीं सदी की शिक्षा में रचनावादी दृष्टिकोण को केंद्रीय स्थान
प्राप्त है। इस दृष्टिकोण के अनुसार ज्ञान कोई स्थिर वस्तु नहीं है जिसे शिक्षक से
छात्र तक स्थानांतरित कर दिया जाए, बल्कि यह शिक्षार्थी द्वारा अपने अनुभवों, सामाजिक
अंतःक्रियाओं और चिंतन के माध्यम से निर्मित किया जाता है। शिक्षार्थी सक्रिय
भूमिका निभाता है, जबकि शिक्षक मार्गदर्शक, प्रेरक और सहायक की भूमिका में रहता है। यह
दृष्टिकोण सीखने को अधिक अर्थपूर्ण, स्थायी और अनुभव-आधारित बनाता है। आधुनिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य केवल तथ्यों का संप्रेषण
नहीं,
बल्कि शिक्षार्थियों
में आलोचनात्मक चिंतन, तार्किक विश्लेषण, समस्या-समाधान और रचनात्मकता का विकास करना
है। इससे विद्यार्थी सूचना का मूल्यांकन करना, वैकल्पिक दृष्टिकोण अपनाना और नवाचारी
समाधान प्रस्तुत करना सीखते हैं। ऐसे गुण उन्हें तेजी से बदलती सामाजिक और तकनीकी
परिस्थितियों में आत्मनिर्भर और निर्णयक्षम बनाते हैं।
(v) जीवनपर्यंत
शिक्षा (Lifelong
Learning) - 21वीं शताब्दी में ज्ञान और तकनीक में तीव्र परिवर्तन हो रहे
हैं, इसलिए शिक्षा को
जीवन के किसी एक चरण तक सीमित नहीं किया जा सकता। जीवनपर्यंत शिक्षा का अर्थ है—व्यक्ति का अपने
पूरे जीवनकाल में निरंतर सीखते रहना। इसमें औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ अनौपचारिक, अनुभवात्मक और
स्व-प्रेरित अधिगम भी शामिल है। यह अवधारणा व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक
रूप से सतत विकसित होने में सहायता करती है। आधुनिक समाज में
कौशल आधारित ज्ञान को अत्यधिक महत्व दिया जा रहा है। संचार कौशल, डिजिटल साक्षरता, सहयोग, समस्या-समाधान, अनुकूलन क्षमता और
नवाचार जैसे कौशल रोजगारयोग्यता और व्यक्तिगत विकास के लिए अनिवार्य बन गए हैं।
जीवनपर्यंत शिक्षा व्यक्ति को निरंतर अद्यतन रखती है और उसे प्रतिस्पर्धी, लचीला तथा
आत्मनिर्भर बनाती है।
9. ज्ञान और शिक्षा का संबंध (Knowledge
and Education):
·
शिक्षा ज्ञान के संचरण, सृजन
और उपयोग का माध्यम है - शिक्षा और ज्ञान के बीच
अत्यंत घनिष्ठ तथा परस्पर निर्भर संबंध है। शिक्षा वह प्रमुख माध्यम है जिसके
द्वारा ज्ञान का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचरण होता है। विद्यालय, महाविद्यालय और
विश्वविद्यालय न केवल पहले से संचित ज्ञान को शिक्षार्थियों तक पहुँचाते हैं, बल्कि नए ज्ञान के सृजन
का भी केंद्र होते हैं। अनुसंधान, प्रयोग, विमर्श और आलोचनात्मक अध्ययन के माध्यम से
शिक्षा ज्ञान को निरंतर समृद्ध करती है। इसके अतिरिक्त, शिक्षा व्यक्ति को
यह भी सिखाती है कि ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उपयोग किया जाए, ताकि वह व्यक्तिगत
विकास के साथ-साथ सामाजिक प्रगति में भी योगदान दे सके। इस प्रकार शिक्षा ज्ञान के
संरक्षण,
विस्तार और
अनुप्रयोग—तीनों की आधारशिला है।
·
आधुनिक शिक्षा में ज्ञान को गतिशील और सामाजिक माना जाता है
- आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान को स्थिर, अपरिवर्तनीय या केवल
पुस्तकों तक सीमित नहीं माना जाता। इसके विपरीत, ज्ञान को एक गतिशील, विकसित होने वाली और
सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। ज्ञान समाज, संस्कृति, समय और परिस्थितियों
के अनुसार निरंतर परिवर्तित होता रहता है। शिक्षार्थी अपने सामाजिक अनुभवों, संवाद और सहयोग के
माध्यम से ज्ञान का निर्माण करते हैं। आधुनिक शिक्षा में समूह चर्चा, परियोजना कार्य और
अनुभव आधारित अधिगम को इसी कारण महत्व दिया गया है। इस दृष्टिकोण में ज्ञान
व्यक्तिगत समझ के साथ-साथ सामाजिक अंतःक्रिया का परिणाम होता है, जिससे सीखना अधिक
सार्थक और जीवनोपयोगी बनता है।
·
शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि विवेकशील नागरिक बनाना है
- शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल तथ्यों और सूचनाओं का
संग्रह कराना नहीं है। आधुनिक शिक्षा का लक्ष्य ऐसे विवेकशील, जागरूक और उत्तरदायी
नागरिकों का निर्माण करना है जो तर्कसंगत सोच, नैतिक मूल्यों और सामाजिक दायित्वों से
युक्त हों। शिक्षा व्यक्ति में आलोचनात्मक चिंतन, निर्णय क्षमता, सहिष्णुता और
लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने
अधिकारों को समझता है, बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग बनता है। इस प्रकार
शिक्षा ज्ञान को मानव कल्याण और सामाजिक उत्थान का प्रभावी साधन बनाती है।
10.
निष्कर्ष
(Conclusion):