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Difference Among Curriculum, Syllabus, and Textbooksपाठ्यक्रम, पाठ्यक्रम सूची और पाठ्यपुस्तक के बीच अन्तर

1. प्रस्तावना (Introduction):

शिक्षा की योजना, संचालन और मूल्यांकन में पाठ्यचर्या (Curriculum), पाठ्यक्रम (Syllabus) और पाठ्य-पुस्तक (Textbook)इन तीनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और परस्पर पूरक है। अक्सर इन शब्दों का प्रयोग सामान्य बातचीत या शैक्षणिक संदर्भ में एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, जिससे शिक्षक, विद्यार्थी और नीति-निर्माता दोनों ही वैचारिक भ्रम का शिकार हो सकते हैं। वास्तव में, ये तीनों अवधारणाएँ आपस में संबंधित होते हुए भी अपने उद्देश्य, स्वरूप, दायरा और कार्यान्वयन की दृष्टि से भिन्न हैं।

पाठ्यचर्या एक व्यापक और समग्र ढांचा प्रस्तुत करती है, जो शिक्षा के उद्देश्य, सामाजिक आवश्यकताओं और व्यक्तित्व विकास की दिशा को निर्धारित करती है। यह निर्धारित करती है कि किन ज्ञान क्षेत्रों, कौशलों और मूल्यों को विद्यार्थियों तक पहुँचाना आवश्यक है, तथा शिक्षा किस प्रकार से समाज और संस्कृति के अनुरूप होनी चाहिए। पाठ्यक्रम इसके भीतर एक संरचित रूप में विषय-वस्तु और शिक्षण इकाइयों का निर्धारण करता है। यह तय करता है कि कौन-से विषय, अध्याय या इकाई किस क्रम और स्तर पर पढ़ाए जाएंगे, जिससे सीखने की प्रक्रिया व्यवस्थित और सहज हो। पाठ्य-पुस्तकें पाठ्यक्रम को क्रियान्वित करने का माध्यम हैं। ये शिक्षक और विद्यार्थी के बीच ज्ञान और विचारों का पुल बनाती हैं। पाठ्य-पुस्तकें केवल जानकारी का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि वे शिक्षण और अधिगम को सुविधाजनक, स्पष्ट और आकर्षक बनाने का कार्य करती हैं। इनके माध्यम से छात्र विषय की गहन समझ प्राप्त करते हैं, उदाहरणों और अभ्यासों के जरिए सीखने की प्रक्रिया को अनुभव करते हैं और ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में लागू करना सीखते हैं।

इस प्रकार, किसी भी शिक्षा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पाठ्यचर्या कितनी व्यापक और उद्देश्यपूर्ण है, पाठ्यक्रम कितना संगठित और क्रमबद्ध है, और पाठ्य-पुस्तकें कितनी उपयुक्त, शिक्षण-योग्य और विद्यार्थी-केंद्रित हैं। शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने और सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए इन तीनों घटकों के बीच स्पष्ट अंतर और समन्वय को समझना आवश्यक है। यही कारण है कि शिक्षक, पाठ्यक्रम निर्माता और नीति-निर्माता इन अवधारणाओं को भली-भांति समझें और उनका उपयोग शिक्षार्थियों की संपूर्ण विकास यात्रा में करें।

2. पाठ्यचर्या (Curriculum) : अर्थ एवं अवधारणा

पाठ्यचर्या शिक्षा की वह व्यापक और समग्र रूपरेखा है, जिसके अंतर्गत विद्यालय या शैक्षणिक संस्था द्वारा योजनाबद्ध रूप से प्रदान किए जाने वाले सभी प्रकार के शैक्षिक अनुभव सम्मिलित होते हैं। यह केवल विषयवस्तु का संग्रह नहीं है, बल्कि शिक्षा की समग्र प्रक्रिया, उसके उद्देश्य, शिक्षण-प्रविधियाँ और सीखने के अनुभवों का समन्वित ढांचा प्रस्तुत करती है। पाठ्यचर्या में शामिल घटक केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होते, बल्कि इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण आयाम शामिल होते हैं:

·         शैक्षिक उद्देश्य: यह निर्धारित करता है कि छात्र क्या सीखेंगे, कौन-से कौशल विकसित होंगे और किस प्रकार का व्यक्तित्व निर्माण होगा।

·         शिक्षण-अधिगम गतिविधियाँ: इसमें पाठ्यक्रम आधारित शिक्षण, प्रयोगात्मक गतिविधियाँ, समूह कार्य, परियोजनाएँ और चर्चाएँ शामिल होती हैं।

·         सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ: खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामाजिक सेवा, कला और संगीत जैसी गतिविधियाँ छात्रों के समग्र विकास में योगदान करती हैं।

·         मूल्यांकन प्रणाली: परीक्षा, परियोजना, प्रेजेंटेशन और सतत मूल्यांकन के माध्यम से छात्रों की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है।

·         विद्यालय का सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण: यह छात्र के नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में सहायक होता है।

आधुनिक शैक्षणिक दृष्टिकोण में पाठ्यचर्या को जीवन-केंद्रित और अनुभव-आधारित माना जाता है। इसका उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि छात्रों को वास्तविक जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना, उनकी समस्या-समाधान क्षमता बढ़ाना और उन्हें समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाना है।

3. पाठ्यक्रम (Syllabus) : अर्थ एवं अवधारणा

पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या का एक सीमित, विशिष्ट और व्यवस्थित भाग है। यह किसी विशेष कक्षा, विषय या अध्ययन इकाई के लिए निर्धारित की गई विषयवस्तु की रूपरेखा है, जिसे निश्चित समयावधि में पढ़ाया और समझाया जाना होता है। यदि पाठ्यचर्या व्यापक लक्ष्य और अनुभव का निर्धारण करती है, तो पाठ्यक्रम यह स्पष्ट करता है कि इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किन विषयों, अध्यायों और उपविषयों को कब और किस क्रम में पढ़ाया जाएगा।

पाठ्यक्रम में मुख्यतः निम्नलिखित घटक शामिल होते हैं:

·         विषय-वस्तु की इकाइयाँ: प्रत्येक विषय का विभाजन सुसंगत और उद्देश्यपूर्ण इकाइयों में किया जाता है।

·         अध्याय और उपविषय: प्रत्येक इकाई को अध्यायों और उपविषयों में विभाजित किया जाता है, जिससे शिक्षण और अधिगम क्रमबद्ध हो।

·         क्रमबद्धता: विषयों और अध्यायों का ऐसा क्रम निर्धारित किया जाता है, जिससे छात्र का ज्ञान क्रमिक और तार्किक रूप से विकसित हो।

पाठ्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना होता है कि क्या पढ़ाया जाना है, कितनी अवधि में पढ़ाया जाएगा और किस स्तर पर छात्र की समझ आनी चाहिए। यह शिक्षक को मार्गदर्शन प्रदान करता है और छात्रों को व्यवस्थित अधिगम का अनुभव देता है।

4. पाठ्य-पुस्तक (Text Book) : अर्थ एवं अवधारणा

पाठ्य-पुस्तक वह शिक्षण सामग्री है, जो पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयवस्तु को सरल, व्यवस्थित और शिक्षण-योग्य रूप में प्रस्तुत करती है। यह शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए सहायक साधन होती है और सीखने की प्रक्रिया को सुगम, स्पष्ट और प्रभावी बनाती है।

पाठ्य-पुस्तक निम्नलिखित कार्य करती है:

·         पाठ्यक्रम पर आधारित: यह सुनिश्चित करती है कि शिक्षण सामग्री पाठ्यक्रम की इकाइयों और उद्देश्यों के अनुरूप हो।

·         पाठ्यचर्या के उद्देश्यों को पूरा करना: पाठ्य-पुस्तक में शामिल विषय, गतिविधियाँ और उदाहरण शिक्षा के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप होते हैं।

·         उदाहरण, चित्र, गतिविधियाँ और अभ्यास: ये छात्रों के सीखने के अनुभव को सजीव, आकर्षक और व्यावहारिक बनाते हैं। उदाहरण और गतिविधियाँ अवधारणाओं को सरलता से समझाने में मदद करती हैं, जबकि अभ्यास और परियोजनाएँ सीखने को आत्मसात करने का अवसर प्रदान करती हैं।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक पाठ्य-पुस्तकें ज्ञान के वैचारिक, विश्लेषणात्मक और सृजनात्मक आयामों को विकसित करने पर जोर देती हैं। यह केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी, समस्या-समाधान क्षमता और आलोचनात्मक सोच को भी बढ़ावा देती है।

5. पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम एवं पाठ्य-पुस्तकों के बीच संबंध:

पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक शिक्षा की योजना और कार्यान्वयन के तीन परस्पर जुड़े घटक हैं। इनका संबंध केवल संरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया की समग्र दिशा और गुणवत्ता निर्धारित करता है। इन तीनों घटकों को समझना शिक्षा के उद्देश्यपूर्ण संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पाठ्यचर्या सबसे व्यापक अवधारणा है

पाठ्यचर्या शिक्षा की सबसे व्यापक और समग्र अवधारणा है। यह न केवल विषयगत ज्ञान का निर्धारण करती है, बल्कि शिक्षार्थियों के संपूर्ण विकास, नैतिक और सामाजिक मूल्यों, तथा व्यवहारिक कौशल की दिशा भी तय करती है। पाठ्यचर्या में शैक्षिक उद्देश्य, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और मूल्यांकन प्रणाली सभी शामिल होते हैं। इसलिए इसे शिक्षा की नीतिगत और व्यापक रूपरेखा माना जा सकता है, जो शिक्षा की दिशा, उद्देश्य और समग्र अनुभव को परिभाषित करती है।

पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या का एक भाग है

यदि पाठ्यचर्या शिक्षा की व्यापक योजना है, तो पाठ्यक्रम उसका व्यवस्थित और संरचित अकादमिक भाग है। पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या में निर्धारित लक्ष्यों और उद्देश्यों को आधार बनाकर विषय-वस्तु, अध्याय और इकाइयों का क्रम निर्धारित करता है। यह स्पष्ट करता है कि शिक्षार्थी को कौन-सा ज्ञान किस क्रम और समय अवधि में प्राप्त होगा। पाठ्यक्रम शिक्षण और अधिगम को संगठित और तार्किक दिशा देता है, ताकि छात्रों का सीखना अनुशासित, क्रमिक और उद्देश्यपूर्ण हो।

पाठ्य-पुस्तक पाठ्यक्रम को लागू करने का साधन है

पाठ्य-पुस्तक पाठ्यक्रम को वास्तविक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यह विषय-वस्तु को सरल, व्यवस्थित और समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करती है। पाठ्य-पुस्तक शिक्षक और छात्र दोनों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है, उदाहरण, चित्र, गतिविधियाँ और अभ्यास के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को सक्रिय और प्रभावी बनाती है। आधुनिक दृष्टिकोण में पाठ्य-पुस्तक केवल सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि अधिगम-सहायक और रचनात्मक सामग्री बन गई है, जो शिक्षार्थी के अनुभव और सृजनात्मक क्षमता को प्रोत्साहित करती है।

·         पाठ्यचर्या शिक्षा की दिशा, उद्देश्य और व्यापक अनुभव तय करती है।

·         पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या में निर्धारित लक्ष्यों और उद्देश्यों के आधार पर विषय-वस्तु का अनुक्रम और समय निर्धारण करता है।

·         पाठ्य-पुस्तक पाठ्यक्रम की विषयवस्तु को व्यवहारिक और शिक्षण योग्य रूप में प्रस्तुत करती है।

इस संरचना को समझना और अपनाना शिक्षक, पाठ्यक्रम निर्माता और नीति-निर्माता सभी के लिए आवश्यक है। इससे शिक्षा अधिक संगठित, उद्देश्यपूर्ण और जीवनोपयोगी बनती है, और छात्रों का सीखने का अनुभव केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि समग्र व्यक्तित्व विकास और सामाजिक जिम्मेदारी तक विस्तारित होता है।

6. पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम एवं पाठ्य-पुस्तकों के बीच अंतर:

आधार

पाठ्यचर्या

(Curriculum)

पाठ्यक्रम

(Syllabus)

पाठ्य-पुस्तक

(Text Book)

अर्थ

समस्त शैक्षिक अनुभवों की योजना

विषयवस्तु की सीमित रूपरेखा

पाठ्यक्रम पर आधारित पुस्तक

क्षेत्र

अत्यंत व्यापक

सीमित

अत्यंत सीमित

उद्देश्य

समग्र विकास

ज्ञान की सीमा निर्धारण

शिक्षण-अधिगम में सहायता

प्रकृति

दार्शनिक एवं सामाजिक

अकादमिक

व्यावहारिक

लचीलापन

अधिक

मध्यम

कम

निर्धारण

नीति-निर्माता एवं शिक्षाविद

बोर्ड/विश्वविद्यालय

लेखक/प्रकाशक

अवधि

दीर्घकालिक

निश्चित शैक्षणिक अवधि

पाठ्यक्रम अवधि के अनुरूप

परिवर्तन

समय-समय पर

आवश्यकता अनुसार

पुनर्मुद्रण/संशोधन द्वारा

7. शैक्षिक महत्व (Educational Significance):

पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक के बीच स्पष्ट अंतर को समझना शिक्षा के समग्र और प्रभावी निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि शिक्षक और पाठ्यक्रम निर्माता इन अवधारणाओं को सही ढंग से पहचानते हैं, तो पाठ्यक्रम का निर्माण और संचालन अधिक सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण बन जाता है। स्पष्ट अंतर की समझ से शिक्षक केवल पाठ्य-पुस्तक तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वह छात्र की वास्तविक सीखने की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए शिक्षण-अधिगम गतिविधियों, सह-पाठ्यक्रम अनुभवों और मूल्यांकन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू कर सकते हैं। इससे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक अर्थपूर्ण बनती है क्योंकि शिक्षक छात्रों के अनुभव, रुचि और क्षमताओं के अनुसार शिक्षा को अनुकूलित कर सकते हैं। पाठ्यचर्या के उद्देश्यों की बेहतर प्राप्ति सुनिश्चित होती है, और छात्रों का सीखने का अनुभव केवल जानकारी संग्रह तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि वह समग्र व्यक्तित्व विकास, सामाजिक कौशल और नैतिक मूल्य के विकास में सहायक होता है।

8. सामान्य भ्रांतियाँ (Common Misconceptions):

अक्सर शिक्षा के संदर्भ में कुछ सामान्य भ्रांतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जो शिक्षकों और शिक्षार्थियों दोनों के दृष्टिकोण को सीमित कर देती हैं। इनमें प्रमुख हैं:

·         पाठ्य-पुस्तक को ही पाठ्यक्रम मान लेना: यह सोच सीमित है क्योंकि पाठ्यक्रम केवल पाठ्य-पुस्तक में उपलब्ध विषयों तक नहीं रहता; इसमें शिक्षण-अधिगम गतिविधियाँ, अनुभवात्मक अध्ययन और सह-पाठ्यक्रम अनुभव भी शामिल होते हैं।

·         पाठ्यक्रम को ही पाठ्यचर्या समझ लेना: पाठ्यक्रम केवल शैक्षणिक और विषयगत ढांचा है, जबकि पाठ्यचर्या शिक्षा का व्यापक अनुभव, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और मूल्य आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

·         केवल पुस्तक-आधारित शिक्षा को संपूर्ण शिक्षा मानना: आधुनिक शिक्षा में यह समझने की आवश्यकता है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं आता, बल्कि अनुभव, प्रयोग, सामाजिक संपर्क और रचनात्मक गतिविधियों से भी विकसित होता है।

आधुनिक शिक्षा इन भ्रांतियों से ऊपर उठने पर बल देती है। इसका उद्देश्य शिक्षक और विद्यार्थियों को यह समझाना है कि शिक्षा केवल तथ्यात्मक ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि व्यवहारिक, रचनात्मक और सामाजिक रूप से समृद्ध अनुभव है।

9. समकालीन दृष्टिकोण (Contemporary Perspective):

आज की शिक्षा प्रणाली में पाठ्यचर्या को पारंपरिक दृष्टिकोण से बदलकर शिक्षार्थी-केंद्रित, अनुभव-आधारित और कौशल तथा मूल्य-उन्मुख बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य छात्रों को केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि उन्हें समस्या-समाधान, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मक क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी में सक्षम बनाना है। समकालीन दृष्टिकोण में पाठ्य-पुस्तकें केवल सूचना का स्रोत नहीं रह गई हैं। वे अब अधिगम-सहायक सामग्री बन गई हैं, जो शिक्षण प्रक्रिया को सुगम बनाती हैं, उदाहरण, गतिविधियों और अभ्यास के माध्यम से सीखने को अनुभवजन्य और व्यावहारिक बनाती हैं। शिक्षक पाठ्य-पुस्तक का उपयोग मार्गदर्शन के रूप में करते हैं, जबकि छात्रों की सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इस दृष्टिकोण से शिक्षा अधिक सक्रिय, सहभागी और जीवनोपयोगी बनती है।

10. निष्कर्ष (Conclusion):

पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक शिक्षा प्रणाली के तीन अनिवार्य और परस्पर पूरक घटक हैं। इन तीनों की भूमिका और महत्व अलग-अलग है:

·         पाठ्यचर्या शिक्षा की व्यापक योजना और अनुभव का ढांचा है, जो छात्रों के व्यक्तित्व, सामाजिक कौशल और जीवन के मूल्य आधारित विकास की दिशा निर्धारित करती है।

·         पाठ्यक्रम पाठ्यचर्या का संगठित अकादमिक भाग है, जो विषय-वस्तु, अध्याय और उपविषयों को क्रमबद्ध रूप से निर्धारित करता है और यह स्पष्ट करता है कि कौन-सा ज्ञान किस समय और स्तर पर प्रदान किया जाएगा।

·         पाठ्य-पुस्तक पाठ्यक्रम को व्यवहार में लाने का माध्यम है, जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सरल, सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाती है।

यदि इन तीनों घटकों के बीच संतुलन, स्पष्टता और समन्वय बनाए रखा जाए, तो शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहती। यह व्यक्तित्व विकास, सामाजिक और नैतिक चेतना, रचनात्मकता और व्यवहारिक कौशल को भी विकसित करती है। समग्र रूप से देखा जाए तो शिक्षा अधिक प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और जीवनोपयोगी बनती है, जिससे छात्र न केवल अकादमिक रूप से सक्षम होते हैं, बल्कि समाज और संस्कृति के सक्रिय और जिम्मेदार सदस्य के रूप में भी विकसित होते हैं।

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